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मुर्दों का शहर बनती दिल्ली

क्हते है कि दिल्ली दिलवालों की है। लेकिन आज यह बात बिल्कुल उल्टी होती दिख रही है। दिल्ली में सरेआम लोग सड़कों पर तड़प तड़प कर दम तोड़ देते हैं और लोग अपने काम धंधों पर चले जाते है। सरेआम लड़कियों को चाकू से गोद दिया जाता है लोग मूकदर्शक बने रहते हैं। आये दिन मासूम बच्चियों और महिलाओं के साथ बलात्कार होता लोग इतने संवेदनहीन हो गये है कि उन्हें यह सब रूटीन लगने लगा है। अस्पतालां में मरीजों के लिये बेड नहीं मिलते हैं। मासूम बच्चे को लिये मां-बाप एक अस्पताल से दूसरे अस्पतालों के चक्कर काटते थक जाते हैं और बच्चे इलाज के अभाव में मर जाता हैं।

सरकारें एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगा कर अपना फर्ज निभा देती है। क्या ऐसी दिल्ली को दिल वाली कहते हैं। यहां वही जी सकता है जिसकी जेब में दाम है। रसूख है वहीं बड़ी गाड़ियों में ठाट से घूम कर सरकारी और प्राइवेट सुविधाओं को भोग सकता है। देश और जनता की सेवा के नाम पर वोट लेने वाले नेता सिर्फ बयानबाजी करते रहते है। सरकार और जनप्रतिनिधियों के साथ देश का मीडिया भी सामाजिक मुद्दों को लेकर ज्यादा संजीदा नहीं है। हम भी नेताओं की भाषणबाजी और उनकी चमचागिरी में ज्यादा व्यस्त रहते हैं। देश के पीएम पर फूलों हो रही है।

राजनीतिक दलों को सिर्फ चुनाव को जीतना है। लोगों की जान आज दिल्ली में एक गिलास पानी की कीमत से भी कम हो गयी है।
ताजा मामला दिल्ली के एक दंपति का है जिसके सात साल बेटे अविनाश की जान डेगू के चलते चली जाती है। उस युवा दंपति ने अपने मासूम बच्चे की मौत के वियोग में आत्महत्या कर ली। देश की राजधानी में ऐसा हृदयविदारक हादसा होना हम देशवासियों के लिये शर्म की बात है। लेकिन सरकारें और नेता बेशर्मी से टीवी चैनलों और अन्य मीडिया पर एक दूसरे पर कीचड़ उछालते हैं।

उड़ीसा के छोटे से शहर से आने वाले लक्ष्मीचंद और बबीता ने प्रेम विवाह किया था। दोनों ही रोजगार के चलते दिल्ली आ गये। पिछले कई दिनों से उनके बेटे अविनाश को डेंगू था जिसके इलाज के लिये दिल्ली के पांच बड़े नामचीन अस्पतालों के दोनों ने चक्कर लगाये लेकिन किसी ने उनके बच्चे को भर्ती नहीं किया। आखिर अविनाश ने दम तोड़ दिया। इस बात का लक्ष्मीचंद और बबिता को इतना सदमा लगा कि उन्होंने अपनी जान दे दी। दिल्ली में अविनाश की मौत का कोई असर नहीं पड़ा लेकिन एक युवा दंपति का पूरा घर संसार उजड़ गया।

विनय गोयल के विचार

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