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मासूम बच्चियां आख़िर क्यों बन रही हैं हवस का शिकार……

हम कहां सुरक्षित हैं और आखिर हम कहां जाएं’! यह सवाल केवल मेरे नहीं, बल्कि आजकल हर महिला के मन में चल रहा है। पिछले कुछ समय से लगातार कुछ घटनाओं ने स्त्री के सामने यह चुनौती खड़ी कर दी है कि वे सोचें कि इस सामाजिक व्यवस्था में उनका वजूद क्या है! दिल्ली देश की राजधानी जिसकी पहचान लालकिला और क़ुतुब मीनार है लेकिन आज इसके माथे पर एक कलंक है वो कलंक जिसको शायद कोई भी समाज स्वीकार न करे हम बात कर रहे हैं एक ऐसे सच की जिसकी कड़वाहट शायद हमारी रूह को झकझोर के रख दे, दिल्ली में तक़रीबन रोज़ाना 20 बच्चे ग़ायब होते हैं आखिर वो किसका शिकार होते हैं कौन लोग हैं जो उन मासूम बच्चियों को अपनी हवस का शिकार बनाते हैं, आज के ज़माने में इंसान की फितरत की हम बात करें तो हर इंसान अपने आपको एक बेहतरीन इंसान समझता है लेकिन हक़ीक़त कुछ और है हमारे ही समाज में ऐसे लोग भी हैं

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जो मासूम बच्चियों को अपनी हवस का शिकार बनाते हैं वो मासूम बच्चियां जिन्हें अभी पता भी नही की सेक्स क्या होता है और वही दरिंदगी की जाती है तो उस बच्ची की आत्मा हिल जाती है और वो सोचने पर मजबूर हो जाती है के मैं उस जंगल में रहती हूँ जहाँ जानवर को देखना भी आता है बोलना भी आता है और बड़ी बड़ी बाते भी करनी आती हैं अगर हम बीते कुछ दिल्ली के मामलों पर नज़र डालें तो जानकर हैरत होगी एक सीरियल रेपिस्ट सुनील रस्तोगी जो 12 वर्षो में करीब 500 से ज्यादा बच्चियों को हवस का शिकार बना चुका है । आरोपी कई लड़कियों को अपने सामने कपड़े पहनने को मजबूर करता था ।

ऐसी अनगिनत घटनाएं हर रोज़ देश में होतीं रहतीं हैं। घर की दहलीज के बाहर जब कोई बच्ची क़दम रखती है तो वो सड़क के गुनाहगारो से बचने की कोशिश करती है लेकिन सवाल ये उठता है जब वो ही बच्ची अपने घर में किसी अपने की हवस का शिकार हो जाती है तो उसकी चीखे बंद दीवारों में दब कर रह जातीं हैं  लेकिन अपने घर में आसपास मौजूद परिचित या संबंधी की खाल ओढ़े ऐसे अपराधी मानसिकता वालों को हम कैसे पहचानें? इन सवालों पर सोचते हुए कई बार परेशानी बहुत बढ़ जाती है और रास्ते धुंधले लगने लगते हैं।

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आज हमारा समाज अपने आपको सभ्य कहता है और अपनी अगली पीढ़ी को पढ़ाने-लिखाने का दावा करता है, लेकिन अभी भी बहुत से सवाल हैं जिसका जवाब शायद इस युग में मिलना मुश्किल हो लेकिन बच्चीयों को अपनी हवस का शिकार बनाने वाले उन पिछड़े दिमाग के लोगों के लिए मनोवैज्ञानिक सलाह और शिक्षा पर ज़ोर देने की ज़रूरत है। जब तक एक दूसरे की भावनाओं और दुख को समझने के सहज हालात नहीं बनेंगे, तब तक एक सभ्य समाज की कल्पना बेमानी है।

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