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कड़वा सच: सोच बदलने की कवायद …

यूं तो भारत अनेकता में एकता वाला देश है। यहां अनेक धर्मों और जाति के लोग रहते हैं, प्रत्येक दस किलोमीटर पर यहां बोली और भाषा बदल जाती है। लेकिन आज आपको दूर जाने की आवश्यकता नहीं आपको अपने ही घर में विभिन्न सोच वाले लोग मिल जाएंगे। आज के युग में जो बदलाव आए हैं वे असहनीय बदलाव हैं। आज भारत एक ऐसा देश बन गया है जहां किसी अभिनेता की मृत्यू पर पूरा देश भावुक हो उठता है, सोशल मीडिया पर शोक मनाया जाने लगता है। लेकिन वहीं जब कोई जवान शहीद होता है तो उसे कोई याद तक नहीं करता। याद करते भी हैं तो एक दिन और फिर भूल जाते हैं। यहां बड़ी-बड़ी बातें तो सभी करते हैं किन्तु जब कुछ करने की बारी आती है तो सब हाथ खड़े कर देते हैं। अभी हाल ही में ‘बाहुबली 2’ फिल्म आई, देश का हर व्यक्ति ये पूछ रहा था कि ‘कटप्पा ने बाहुबली को क्यूं मारा’ लेकिन उससे दो दिन पहले छत्तीसगढ़ में जिन 26 सैनिकों की मौत हुई उनका कहीं कोई जिक्र नहीं था।

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ये वो देश है जहां लोग एंबुलेंस को रास्ता देने की बजाय जल्दी के चक्कर में एंबुलेंस के पीछे अपनी गाड़ियां लगा देते हैं। जहां ये लिखा होता है कि कृपया यहां शौच न करें, लोग वहां शौच करते हैं। यहां कहीं कोई घटना हो जाए तो अगले दिन लोग हाथ में कैंडल लिए निकल पड़ते हैं, लेकिन उस घटना को अंजाम देने वाले भी कोई और नहीं। इन्हीं में से कोई या इन्हीं का कोई भाई उस घटना के लिए जिम्मेदार है।

तमाम बुद्धिजीवी लोग यहां हर मुद्दे पर अपनी राय देते मिल जाएंगे। यहां भेदभाव को खत्म करने की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले बहुत लोग हैं लेकिन जब खुद पर बात आती है तो वे लोग ही भेदभाव करते हैं। सालों से लोग कहते हैं कि भगवान एक है लेकिन हिन्दु-मुस्लिम के नाम पर यहां दंगे होते हैं।

यहां की सरकारें दावा करती हैं कि सब बराबर हैं लेकिन लोग खुद अपने आप को कमजोर बताने पर जोर देते हैं कि उनको कुछ लाभ मिल सके। यहां अच्छे भले मुस्टंडे लोगों को भी आरक्षण चाहिए और लड़कियों को खुद के लड़की होने का फायदा। कोई नहीं चाहता कि उसको कमजोर या बेचारा कहा जाए, लेकिन कमजोर बनना सब चाहते हैं। क्यूंकि कमजोर बनने में उनको अपना फायदा जो दिखाई देता है। लड़कियां मेट्रो में लेडीज सीट से उस वृद्ध आदमी को उठाने में भी संकोच नहीं करतीं जिसकी उम्र 60 से 70 के बीच होती है। क्या वे उस वृद्ध से भी कमजोर हैं। यूं तो वे दावा करती हैं कि लड़कियां और लड़के बराबर हैं लेकिन जहां  उनको लड़की होने के कारण कोई प्राथमिकता मिलती है तो वे आगे होती हैं। क्यूंकि बराबर का अर्थ है बराबर, न कि कमजोर।

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यहां बस या मेट्रो में लड़का अपनी सीट तब ही लड़की को दे सकता है जब लड़की सुंदर हो, क्यूंकि उसे लड़की की नज़रों में जेन्टलमैन जो बनना है। वहीं किसी सामान्य सी लड़की नज़रों में जेन्टलमैन बनने का उसको कोई शौक नहीं।

यहां गरीब भूखे ब्राम्हण को आरक्षण नहीं मिलता लेकिन, एक हट्टे कट्टे दलित को आरक्षण मिलता है। लड़कियों को हर जगह अपने लड़की होने का रॉब दिखाना होता है और कुछ चाहिए मिलता है बनकर मिल जाते हैं विशेष अधिकार और युवकों का मिल जाता है आरक्षण।

उपेन्द्र वशिष्ठ के निजी विचार…

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