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सोच का दायरा आखिर बनता क्यों हैं?

thinking

कहने को तो लोग बड़े ही गर्व से कह देते हैं कि वो 21वीं सदी में रहते है, मगर क्या कभी किसी ने इस बात पर गौर किया है कि भले ही हम 21वीं सदी में रह रहे हो लेकिन आज भी कुछ लोगों की सोच हमे सोचने पर मजबूर …

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नोटबंदी कालेधन का समाधान या फिर कालेधन पे सवाल

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8 नवम्बर से पहले किसी ने सोचा नहीं था की उनके पास जो पैसा है वह आने वाले दिनों में उनकी परेशानी का सबब बनने वाला है, और काला धन को रखने वालों के यहां तो जैसे भूचाल आ गया। प्रधानमंत्री का यह फैसला काले धन को रोकने के लिए …

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दूसरों की बेटियां छोटे कपड़ो में और अपनी

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दूसरों की बेटियां छोटे कपड़ों में भाती हैं लेकिन जब अपने घर की बेटी पर बात आए तो लोगों को शर्म आने लगती हैं। कोई दूसरी लड़की पब में जाकर ड्रिंक करे तो लोग कहते हैं wow dats so cool, लेकिन जब अपने घर की लड़कियों की बात आए तो …

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कैशलेस सिस्टम एक समस्या या फिर हल?

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कैशलैस में समस्या नही, समस्या कैशलैस के तरीके में है। जनता तो आज कैशलैस होने को तैयार है, समस्या तो साधनों की उपलब्धता की है। दिल्ली मैट्रो इसका बे-जोंड उदाहरण है, मैंट्रो की लाईन की दिक्कत से उबरने के लिए लोगों ने तुरंत मैट्रो कार्ड का विकल्प चुना। जबकि होना …

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नोटबदली कालाधन खत्म करेगी, या मंदी लाएगी?

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कोई भी कालाधनधारक कैश/नकदी मुख्यतः तात्कालिक उपभोग जरूरतों और लाभदायक सौदों पर खर्च करने भर के लिए रखता है। लाभदायक सौदे जैसे जमीन, सोना-चाँदी, हवाला के माध्यम विदेशी बांड में निवेश कर कैश के बोझ से मुक्त हो जाता है। कालाधन पैदा करने की भी एक प्रक्रिया है,  जो कैशलैश भी होती है। जी …

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विश्व भाषा का मिथक एवं लोकतंत्र

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लोकतंत्र में शासन में जनता की सहभागिता तभी आ सकती है जब शासन व्यवस्था जन-भाषाओं में संचालित हो। इंग्लैड़ समेत सम्पूर्ण यूरोप में लोकतंत्र के विकास के साथ वहाँ की जनभाषाएं शासन प्रशासन और शिक्षा का हिस्सा बनी। यूरोप में भी जब आम जन ने प्रोटेस्टेंट मूवमेंट के द्वारा न …

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तो क्या नोटबंदी सिर्फ जनता के लिये है, बीजेपी के लिये नहीं

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मोदी सरकार के नोटबंदी के फैसले का असर केवल भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी चर्चा का विषय बना हुआ है। पूरे देश में हाहाकार मचा हुआ है। जनता अपने घरों में नहीं बल्कि बैंको की दहलीज पर सोने को मजबूर है। इसे भी पढ़े : मुल्क की …

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आम से खास बनता सोच का दायरा…

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हमारा संविधान जिसे हम हमारा कह रहे हैं, क्या वो हमारा हैं? दरअसल आज के वक्त में हमारा रहा ही नहीं हैं। मुझे 2014 के पहले का दौर याद आ रहा हैं, जहां पर सरकार की आलोचना करने पर हमले नहीं हुआ करते थे। वो दौर था जहां लोग खुलकर …

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मुल्क की दुर्भाग्यवश आवाम, जो हो रही हैं कुर्बान…

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500-1000 के नोटबंदी की गूंज आपको संसद से लेकर सड़क तक हर जगह सुनने को मिलेगी। 8 नवम्बर की मध्य-रात्रि प्रधानमंत्री का देश के नाम संबोधन पश्चात 500-1000 के पुराने नोट रद्दी हो गए। जिन्होंने भी वरसो-वरस से भ्रष्टाचार करके लाखों-करोड़ो रुपए बचा के रखे थे, अब महज वो कागज …

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जालिम को जो न रोके वो शामिल हैं जुल्म में…

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पीएम मोदी ने कहा लोगों को तकलीफें तो होगी सह लो…. क्या ऐसी ही तकलीफों की बातें की गई थी ? देश के तमाम हिस्सों से खबरें आ रही हैं कि कही इलाज की वजह से किसी बच्चे की मौत हुई, तो कहीं औरतों के साथ मारपीट की गई, तो …

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