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खुला खत

समय बदल गया…

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बचपन के वो दिन, आज भी पुकारते हैं, सोच वही है, समय बदल गया। अपनी यादों को समेटे हुए, प्यार से दुलारते हैं, प्यार वही है, समय बदल गया। धुंधली आंखों से बुढापे में, आज भी बुलातें हैं, नज़रिया वही है, समय बदल गया। बाहें फैलाये हुए, आज भी गले …

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अंधकार में संस्कार…

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डूब जाएगा अंधकार में संस्कार एक दिन, पहचान के लिये तड़पोगे जनाब एक दिन, बिन पहचान हो जाओगे नाकाम एक दिन, अंधकार में डूब जाएगा सम्मान एक दिन, जमीर भी तो मांगेगा हिसाब एक दिन, छुप-छुप के मांगोगे अधिकार एक दिन, डूब जाएगी अंधकार में आवाम एक दिन, पहचान के …

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दो टुक, प्यार में…

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  दो टुक कह सका प्यार में कहने को तो बहुत कुछ था, एहसास का समंदर दिल में बहने को तो बहुत कुछ था, दिल की बात छुपा चेहरों से दिखने को तो बहुत कुछ था, दिल की बातें दिल की जुबां से  दो टुक में तो बहुत कुछ था, …

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आईना खुद का…

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ज़िंदगी के सफर में, आईना खुद का खुद के आईने में, जीवन खुद का खुशहाल जीवन का, आईना खुद का खुद के आईने में, सफर खुद का सोच के सफर में, प्रयास खुद का खुद के आईने में, मंजिल खुद का सफर में कदम, लड़खड़ाये खुद का खुद के आईने …

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कोशिश करें तो हार नहीं…

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  कोशिश करें तो हार नहीं, इरादे पक्के हों तो, मेहनत बेकार नहीं उम्मीद करें तो, अंधकार नहीं वक्त लगेगा मिलेगी मंजिल, अंधकार नहीं सोच की उपज कंगाल नहीं, सोच उगलेगी, एक दिन सोना, इंकार नहीं वक्त का तकाज़ा है, हार नहीं जीत तो हमारी है, उसकी दरकार नहीं मझधार …

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सपनों की मंजिल…

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मंजिल अंजान गलियों में घूमता गया करीब होकर भी दूर मंजिल था ठोकर खाकर भी चलता गया दिल के करीब वो मंजिल था हर जुल्म को भी सहता गया दिल से संजोया वो मंजिल था करीब होकर भी भटकता गया अंजान गलियों में वो मंजिल था लोगों के तंज को …

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इंतज़ार…

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सुबह भेजने की जल्दी शाम को इंतज़ार करती है, घर आने की खुशी देरी का तकरार करती है, दिल में खुशी चेहरे पे गुस्सा आंखों से इकरार करती है, इश्क में इंसानियत की दिल से दीदार करती है, प्यार को लब्ज़ों से नहीं आंखों से बयां करती है, हुई देरी …

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वो पराई हो गई…

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सपनों की वो गुड़िया जो संग में खेला करती थी वो पराई हो गई, कल तक थी वो लाड़ली बात बात में झमेला करती थी वो पराई हो गई, एक पेड़ की थी वो टहनी हर पल को संजोया करती थी वो पराई हो गई, परंपराओं की थी वो विडंबना …

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बेसहारा हो गया…

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बेसहारा हरे भरे बाग का बागवां बेसहारा हो गया, उम्मीदों में लगा पेड़ अब बड़ा हो गया, छांव के लिये तरसता बागवां बेसहारा हो गया, खून पसीने से सींचा पेड़ अब वो खड़ा हो गया, फल खाने के समय बागवां बेसहारा हो गया, चार दीवारियों से घिरा पेड़ अब हरा …

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जागों लाइनों में खड़े हो जाओ

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कवि की कविता जो लोगों को एहसास कराती हैं जिन्दगी से जुड़े फलसफों के बारे में… बचो देश के गद्दारों से, “भारत माता” का नारा लगाएगा नासमझी थी, समझाकर, देशवासियों को लूट जाएगा जागों लाइनों में खड़े हो जाओ, देश का काला धन खत्म हो जाएगा। तुम्हारे कंधों पे बंदूक …

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