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महागठबंधन में दरारः सत्ता के लिये कुछ भी करेंगे

राजनेताओं का चरित्र इस कदर गिर चुका है कि उनमें नैतिकता ढूंढना बेमानी होगा। हम अगर बिहार के सीएम नीतीश कुमार के बारे में कहें कि वो आज तक सुशासन बाबू के रूप जानते थे। लेकिन लोग उन्हें शायद मौकापरस्त के नाम से भी जानने लगेंगे। बिहार में राजनीति मे बुधवार की शाम अचानक इस्तीफा दे दिया और महागठबंधन के ताबूत में आखिरी कील ठोक दी। उन्होंने इस्तीफा देते समय यह बयान दिया कि ऐसा उन्होंने अंतरात्मा की आवाज सुनी और इस्तीफा दे दिया। लोग यह जानना चाहते हैं कि पिछले चुनाव से आजतक अपनी अंतरात्मा की आवाज नहीं सुनाई दी। लालू चुनाव से पहले ही चारा घोटाले में अभियुक्त थे और उन्हें इसके लिये जेल भी जाना पड़ा। तब उन्हें उनके साथ गठबंधन करने में कोई गुरेज नहीं हुआ। उसी समय राजनीतिक पंडितों ने यह कहना शुरू कर दिया था कि यह महागठबंघन ज्यादा दिन नहीं चलेगा। क्यों कि नीतीश कुमार को बीजेपी को बिहार में रोकना था। इसलिये लालू जैसे लोगों से हाथ मिलाने पर भी गुरेज नहीं किया है। लोगों का यह भी मानना था कि सालू और नीतीश के स्वभाव आपस में मेल नहीं खाते हैं। यह गठबधन मजबूरी वश किया गया था। इसे तो आज नहीं कल टूटना ही था।

कल तक बीजेपी बिहार में गुंडाराज और सरकार की विफलता का ढोल बजा रही थी। आज सरकार में आते ही बिहार के सीएम नीतीश कुमार की शान में कसीदे पढ़ रही है। सत्ता के लिये उन्होंने लालू और उनके बेटों परिवार में कोई बुराई नहीं दिखी थी। बड़े शान से मुख्यमंत्री बने और तेजस्वी को उप मुख्यमंत्री बनाया। लेकिन तेजस्वी के खिलाफ एक एफआईआर दर्ज होने से उन्हें इतनी तकलीफ हुई कि उन्होंने महागठबंधन को ही भंग कर इस्तीफा दे दिया और अपने को एक साफ छवि का राजनेता बताने की कोशिश कर रहे हैं। और उसी बीजेपी से हाथ मिला लिये जिसे उन्होंने चार साल पहले मोदी का विरोध करते हुए साथ छोड़ दिया था। नीतीश कुमार का यह रवैया शायद कुछ लोगों का रास न आये। वो कहें कि नितीश ने सत्ता लोभ में थूक कर चाट लिया और उसी बीजेपी को साथी बना लिया जिसने उनके डीएनए में दोष बताया था। आज एक बार फिर सांप और नेवले ने गठबंधन कर लोगों को एहसास करा दिया कि राजनीति में कोई लंबे समय तक विरोधी नहीं होते हैं। सत्ता के लिये वो अवाम को सिर्फ मोहरे की तरह इस्तेमाल करते हैं। पहले भी नितीश ने बीजेपी के साथ मिलकर जार्ज फर्नांडीस की सरकार गिरवायी थी। एक बार फिर नीतीश का असली चेहरा लोगों के सामने आ गया है।

बिहार में एक बार भी सीएम बनने के बाद नीतीश ने इस नये गठबंधन पर सफाई दी कि उन्होंने बीजेपी से इस लिये हाथ मिलाये क्योंकि उन्हें बिहार के लोगों के लिये काम करना है। यहां के विकास के लिये जरूरी है कि केन्द्र की सरकार मेलजोल जरूरी है। बहार सरकार में भागीदार बनने के साथ उन्होंने अपना उपराष्ट्रपति बनाने की ओर एक बड़ा कदम भी उठा लिया है। इससे विपक्ष को नितीश ने एक बार फिर झटका दिया है।

महागठबंधन की आशा पर पानी फेरते हुए नितीश ने बीजेपी के गले में बाहें डाल दी। ऐसे में सबसे ज्यादा परेशानी कांग्रेस को होने वाली है। कांग्रेस आगामी 2019 चुनाव के लिये सपा, बसपा, राजद और अन्य दलों के लिये बिहार की तर्ज पर महागठबंधन बनाने की मंशा अब ख्वाब बन कर रह गयी है।

विनय गोयल के विचार

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