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ये हवेली मिर्जा ग़ालिब है…

उर्दू के सबसे बड़े और बेहतरीन शायर मिर्जा गालिब जैसी शख्सियत को शब्दों में बयां कर पाना बेहद ही मुश्किल काम है, इतना साहस शायद ही कोई जुटा पाए, लेकिन इतना जरुर कहेंगे कि जो लोग शायरी का अर्थ समझते होंगे वो ही उन्हें समझने की काबिलियत रखते हैं। अपने दौर के सबसे महान शायर ग़ालिब का जन्म यूं तो उत्तर प्रदेश के आगरा में 27 दिसंबर, 1797 को हुआ था लेकिन बाद में वो दिल्ली में आ गए। दिल्ली में कई जगह रहने के बाद उन्होंने पुरानी दिल्ली में अपना एक प्यारा सा आशियां बनाया, जिसे हवेली मिर्जा साहिब के नाम से जाना जाता है। लोग उनकी जिन शायरियों को आज दोहराते हैं, उनमें से कई गालिब ने अपने इसी आशियाने के आंगन में बैठकर कागज़ पर उकेरी होंगी। इतना ही नहीं अपनी आखिरी सांस भी गालिब ने 15 फरवरी, 1869 को इसी हवेली में ली थी।

जब आप भी पुरानी दिल्ली की हवेलियों से होकर गुजरेंगे तो आपको भारत सरकार का लगा हुआ एक बोर्ड नजर आएगा, जिस पर उर्दू, अंग्रेज़ी और हिंदी में लिखा है, हवेली मिर्जा ग़ालिब। रिपोर्ट्स के अनुसार भले ही मिर्जा गालिब की इस हवेली को सन् 1999 में सरकार ने पुनर्जीवित किया हो, लेकिन आज गालिब के इस पते से कई लोग अंजान हैं या फिर यूं कहें उनकी इस हवेली की जानकारी लोगों तक नहीं पहुंच पाई है। बहरहाल उनके बारे में क्या कहें, जिनको मशहूर शायर गालिब की शायरी की समझ नहीं लेकिन हां इतना जरूर है कि जो समझ सके गालिब को उस के लिए ये जगह किसी खजाने से कम नहीं है।

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