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दिल्ली की हवा में ज़हर इस कदर घुला है जैसे देश में जाति का ज़हर…

जिस देश में प्रदूषण से हर मिनट 5 मौत होती हों, जिस देश में प्रति व्यक्ति पर 21 हज़ार रुपए पर्यावरण खर्च का बजट हो, जिस देश में पर्यावरण को लेकर राज्यों का कोई बजट न हो, उस देश की राजधानी है दिल्ली। पिछले कुछ दिनों से दिल्ली की जनता परेशान है, हवा में ज़हर घुला हुआ है। बाहर जाना मुश्किल है सुबह टहल भी नहीं सकते दौड़ने की बात तो छोड़ ही दो। सरकार ने फरमान सुनाया कि स्कूलों को बंद कर दिया जाए, जब जरुरत ना हो तो बाहर ना जाएं, लेकिन इस से क्या बदल जाने वाला है। लोग मर रहे हैं बीमार हो रहे हैं लेकिन किसी को कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला। पिछले महीने जितनी गाड़ियां दिल्ली की सड़कों पर थीं आज भी उतनी ही हैं। प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है सरकार के पास कोई एक्शन प्लान नहीं है कि वो इसे कम कर सके। सरकारों को प्रदूषण से मरने वाले लोगों से कोई हमदर्दी नहीं है। AIIMS की भी हालत ठीक नहीं है। डॉक्टर्स की कमी से पूरा देश जूझ रहा है और सरकार स्वास्थ्य का बजट कम करने में लगी है। दिल्ली का प्रदूषण कोई नई बात नहीं है पिछले साल भी ऐसा ही हाल था, साल 2015 में भी और ना जाने कितने सालों से दिल्ली की हवा जहरीली होती चली आ रही है, पर ना आज की सरकार के पास कोई ठोस उपाय है ना ही पिछली सरकारों के पास था। इतना तो तय है कि दिल्ली की हवा एक दिन में प्रदूषित नहीं हुई है हवा को प्रदूषित करने में हम सबने वर्षों लगाए हैं और आज यही हवा हमारी सांसों को रोक रही है धीरे-धीरे हमारा दम घोंट रही है और हम मर रहे हैं, लेकिन ऐसा कब तक चलेगा। हम कब तक चुप बैठे रहेंगे कि हमारी सरकारें इस आवो-हवा को ठीक करने के लिए कुछ करें। हमारी सरकारें निकम्मी हो गई हैं तो क्या हम इस आबो-हवा को ठीक करने के लिए कुछ कर नहीं सकते क्या।

या हम भी हाथ पर हाथ धरे बैठे रहेंगे कि कोई मसीहा आएगा और सबकुछ ठीक कर देगा। लेकिन ऐसा कुछ नहीं होने वाला। ये देश हम सब का है अगर इस देश की हालत ऐसी है तो इसके जिम्मेदार भी हम सब ही हैं। हां मैं मानता हूं कि हमें अपनी सरकारों से कुछ ज्यादा ही उम्मीदें रहती हैं लेकिन देश भर की राज्य सरकारों से लेकर केन्द्र सरकारों तक सबका हाल एक जैसा ही है। चुनाव आते ही वो एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाना शुरु कर देते हैं आपस में ही सब एक दूसरे को कोसते रहते हैं जनता से किसी को मतलब ही नहीं है। कई बार लगता है कि कोई नई पार्टी या कोई युवा नेता आएगा तो शायद कुछ बदल जाए लेकिन ऐसा होता दिख नहीं रहा। बहुत सारे लोगों को आम आदमी पार्टी से उम्मीद थी कि वो सत्ता में आएगी तो शायद कुछ बदल जाए लेकिन जहां वो काम करना चाहते हैं उन्हें करने नहीं दिया जाता ऐसा उनके कहने के मुताबिक। खैर जो भी हो जितनी आम आदमी पार्टी से उम्मीद थी वो उन उम्मीदों पर खरे तो नहीं उतरे है। बचे हमारे देश के युवा नेता ये आते ही हैं ऐसे मुद्दे के साथ कि इन पर भरोसा ही नहीं होता की ये आगे जाकर कुछ देश के लिए, समाज के लिए करने वाले हैं। देश में जाति नाम का ज़हर इस कदर घुल रहा है जिस तरह दिल्ली की हवा में ज़हर। इस काम में हमारे देश के महान पूर्वजों ने अपना भरपूर योगदान दिया है और इस हद तक दिया है कि 21 वीं शदी के युवा भी बमुश्किल ही इससे बच पाते हैं। जो नए युवा नेता बनकर उभर भी रहे है वो तो पहचाने ही अपनी जाति के नाम से जाते हैं और ये उससे हटकर कुछ करना नहीं चाहते। इनको बस आरक्षण चाहिए जिंदगी किसी को भी नहीं चाहिए, ज़िंदगी रहे ना रहे आरक्षण दे दो। आरक्षण तो आप कल भी ले सकते हो और ना ही लो तो इस देश के लिए बेहतर है लेकिन अगर आप के पास सांस लेने के लिए साफ हवा ही नहीं होगी तो मेरा विश्वास मानिए आरक्षण आपको साफ हवा नहीं दिला सकता। हवा किसी SC, ST या OBC को नहीं जानती, सबको बराबर मिलेगा और प्रदूषित ही मिलेगा।

मुझे उम्मीद है एक दिन हम सब जागेंगे इस पर्यावरण के लिए और जितनी जल्दी जाग जाएं उतना ही अच्छा होगा हम सब के लिए और इस देश के लिए भी। वरना अमीर तो एयरप्योरिफायर खरीद के अपना काम चला ले रहे हैं और ग़रीब लोग अपना देख लें।

लव कुमार के निजी विचार 

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