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इन घटनाओं के बाद करनी पड़ती हैं कुत्ते की पूजा

नई दिल्ली: देश में चली आ रही प्राचीन काल की सभ्यताएं और मान्यताएं अदभुत हैं। देश के हर इलाको की अपनी परम्पराएं हैं जहा उनकी भावनाए प्राचीन कालो से जुड़ी हुई हैं। ऐसे में अगर कोई अदभुत बात या घटना सामने आ जाए तो चौकिए मत, क्योकि यही तो भारत देश की पैराणिक परम्परा हैं। आज से पहले आप लोगो नें यह कभी नही सुना होगा कि कोई ऐसा भी मंदिर हैं जहा कुत्ते की पूजा होती हैं।

हा आपने बिल्कुल सही सुना हैं देश के नक्सल प्रभावित राज्य छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के खपरी गांव में एक प्राचीन मंदिर हैं जिसका नाम कुकुरदेव हैं। यह ऐसा अनोखा मंदिर हैं जहा कुत्ते की पूजा की जाती हैं। ऐसी मान्यताए हैं कि कुकुरदेव के दर्शन करने मात्र से कुकुर खांसी दूर हो जाती हैं साथ ही कुत्ते के काटने का डर भी दूर हो जाता हैँ।

पैराणिक काल से विघामान इस मंदिर की स्थापना नागंवशी शासकों ने करीब 14वी शताब्दी में की थी। मंदिर परिषद के निचले हिस्से में कुकुरदेव की मूर्ति विराजमान हैं साथ ही शिवलिंग भी स्थापित हैं। यहा पर लोग कुकुरदेव के साथ शिंवलिंग की पूजा-अर्चना के लिए आते हैं। आप सभी को पैराणिक काल के, मंदिर परिषद में शिलालेख देखने को मिलेगी साथ ही मंदिर के चारो और नागों की चित्र-कलाएं भी देखने को मिलेगी।

खपरी गांव में ऐसी कहानियां है कि यहा पर बंजारो की बस्ती हुआ करती थी। बंजारो की बस्ती में एक युवक था जिसके पास एक पालतू कुत्ता था। ऐसी कहानिया हैं कि एक वर्ष अचानक गांव में सूखा पड़ा, जिससे लोग परेशान थे। भूख से तड़प रहे थे। ऐसे में उस युवक ने कुत्ते को साहूकार के पास गिरवी रखा।

साहूकार के पास कुत्ता गिरवी रखने के बाद ही साहूकार के यहा चोरी हो गई लेकिन कुत्ते ने चोरो को सामन को छुपाते हुए देख लिया। सुबह हुई कुत्ते ने साहूकार को उस स्थान पर ले गया। जहा पर चोरी का सामान छिपा था। साहूकार खुश था, उसमें उस कुत्ते के सर पर चोरी हुआ थैला बाधकर उसे छोड़ दिया। कुत्ता अपने मालिक के पास जा पहुँचा। मालिक ने उस कुत्ते को देख मार डाला। इसके बाद उसनें कुत्ते के सर से थैला निकाला थैले में एक पत्र था। पत्र को पढ़कर उसे अपनी गलती का अहसास हुआ।

गलती ऐसी थी जिसको सोच वो दुखी होता कोसता लेकिन वो इस गलती का प्रास्चित करना चाहता था। उसनें गलती का प्रास्चित करते हुए कुत्ते की याद में मंदिर के अंदर ही समाधि बना दी। समाधि बनने के दौरान कुत्ते की मूर्ति की स्थापना की गई। जिसके बाद से वो कुकुरदेव के नाम से जाना जाने लगा।

इस बात की जानकारी मंदिर प्रान्गढ़ के अन्दर राज्य के पुरातत्व विभाग की तरफ से दी गई हैं। इस मंदिर पर लोगो की मान्यताए ऐसी हैं कि लोग दूर-दूर से कुकुरदेव के दर्शन करने आते हैं।

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