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सपनों की मंजिल…

मंजिल

अंजान गलियों में घूमता गया

करीब होकर भी दूर मंजिल था

ठोकर खाकर भी चलता गया

दिल के करीब वो मंजिल था

हर जुल्म को भी सहता गया

दिल से संजोया वो मंजिल था

करीब होकर भी भटकता गया

अंजान गलियों में वो मंजिल था

लोगों के तंज को सहता गया

सपनों का वो मंजिल था

चलते हुए जब लड़खड़ा गया

अंधरों में वो मंजिल था

लड़खड़ाते कदम को बढ़ाता गया

दम टूटने से पहले वो मंजिल था

~ एस. प्रसाद

यह कविता उन युवाओं को प्रेरणा देता है जो अपने दिल से खुद की मंजिल को संजोता है और उस प्राप्त करने के लिये हर कठिनाईयों को झेलते हुए उसे प्राप्त करना चाहता है और आखिरकार उसे अपनी मंजिल मिल ही जाती है। कोशिश करे तो हार नहीं, इरादे पक्के हों तो मेहनत बेकार नहीं।

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