Breaking News
Home / गीत-गज़ल / अंग्रेजी स्कूलों से गुजरता हुआ सरकारी भविष्य?

अंग्रेजी स्कूलों से गुजरता हुआ सरकारी भविष्य?

आज स्थिति ये हो गई है कि सरकारी नौकरी की चाहत रखने वाला या सरकारी नौकरी में सेवारत व्यक्ति अपने बच्चों को निजी इंग्लिश मीडियम स्कूलों में पढ़ाता है। आर्थिक रूप से संपन्न सरकारी सेवारत स्थाई शिक्षकों के बच्चे तो निश्चित तौर निजी स्कूलों में ही पढ़ते है।  दूसरी सरकारी सेवाओं में संलगन लोगों की तो बात ही छोड़ दे।  आर्थिक रूप से संपन्न मिडल क्लास के द्वारा अपने बच्चों को सरकारी स्कूल से निकाल लेने के फलस्वरूप सरकारी स्कूल में सिर्फ निम्न तबकों के विद्यार्थी रह गए। एक ऐसा तबका जिसकी चेतना इतनी नहीं हैं कि, गुणवता वाली शिक्षा की मांग कर सके।

इसे भी पढ़े : युवा भारत का गुलाम बचपन

मौके का फायदा उठा कर शासक वर्ग पहले से ही खस्ता हाल शिक्षा को और भी रसातल में पहुँचा रहा है।  25 प्रतिशत आरक्षण के सिफुगे ने निम्न वर्ग में सार्वजनिक फंड से चलने वाले स्कूलों की मांग की जगह निजी स्कूलों में अपने बच्चों के दाखिले की उम्मीद बांध ली है। दूसरी तरफ निजी स्कूलों ने ऐसे अनेको मैकेनिज्म खोज लिए हैं, जिससे निम्न वर्ग से आने वाले विद्यार्थियों का अंगूठा काटा जाए।

school-kid

ध्यान देने की बात ये है कि आज निजी स्कूलों में भेद भाव आर्थिक आधार पर किया जाता है। जिन विद्यार्थियों के मां बाप धन खर्च कर सकते हैं, वे विद्यार्थी ही श्रेष्ठ हैं।  क्योंकि 25 प्रतिशत आरक्षण वाले बच्चों की फीस ही माफ होती हैं। उन्हें बाकी सब खर्च तो झेलने पड़ते ही हैं, जैसे महंगे नोट से, सप्लीमेंटरी बुक, टूर, ड्रेस आदि के खर्च के साथ महंगे ट्यूशन फीस का भी खर्च झेलना पड़ता है और निम्न वर्ग का कोई व्यक्ति किसी तरह दाखिले की लड़ाई जीत भी जाए, तो इन तमाम खर्चों के सामने उसे हथियार गेरने ही पड़ते है।

अधिकतर निम्न वर्ग के लोग अंग्रेजी की चाह में ही अपने बच्चों का दाखिला निजी स्कूलों में करवाते हैं, पर वे यह नहीं समझते कि भाषा व्यक्ति के परिवेश का प्रतिफल हैं, ना कि स्कूल के मीडियम का।  इंग्लिश मीडियम स्कूल में इंग्लिश मीडियम से बच्चा तब ही सीख सकता हैं, जब उसके घर का वातावरण भी उसी तरह का हो। उच्च वर्ग के विद्यार्थी इंग्लिश मीडियम में पढ़ पाते हैं, तो उनके घर ही नहीं, उन फाइव स्टार होटलों में भी अंग्रेजी ही प्रयोग होता हैं जहाँ वे घूमने जाते है।

इसे भी पढ़े : राजनैतिक गलियारों से उठकर, क्या प्रथाए बदल पाएंगे राजनेता

इंग्लिश मीडियम स्कूलों का सम्पूर्ण छिपा पाठ्यक्रम (hidden curriculum) आर्थिक एवं सामाजिक रूप से संपन्न उच्च मध्यमवर्ग, उच्च वर्ग के विद्यार्थियों के अनुकूल है।  जिसकी वजह से निम्न वर्ग के विद्यार्थी इस भवर में फस कर हीन भावना के ही शिकार होते है। 1000  में से एक आध ही सफल होते है, जो शेष समाज के लिए आइकन बन जाते है। अंग्रेजी की चाह में निम्न वर्ग के विद्यार्थी ना तो आगे बढ़ पाते हैं, ना निम्न वर्ग सामूहिक रूप से सार्वजानिक फंड से चलने वाली सामान स्कूल प्रणाली की ही मांग कर पाता है। फिलहाल इतना ही… विस्तार से पढने के लिए मेरी पुस्तक इंग्लिश मीडियम अंग्रेजी राज देखे….

ऐसी परिस्थिति में इलाहबाद हाई कोर्ट का फैसला अपने आप में मिल का पत्थर है | जिसमे सभी सरकारी लाभ के पदों पर बैठे लोगो को निर्देश दिया कि वे अपने बच्चों को अनियार्यतः सरकारी स्कूल में ही दाखिला दिलवाए। इससे शिक्षा में गुणवता की. मांग बढ़ेगी।

लेखक अश्विनी सिंह के निजी विचार

Check Also

….जब तक खुली आंख रहे तब तक याद आते हो

जब चांद आसमां से ताकता है याद आते हो, जब तक खुली आंख रहे तब …