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पत्रकारिता के दोहरे चरित्र से सामना

जनसत्ता एक्सप्रेस में काम करने का अनुभव मेरे लिये काफी अहम् रहा। यहां नामचीन पत्रकार रवींद्र सिंह, सुरेश बहादुर सिंह, आलोक मेहरोत्रा व प्रेम नारायण मिश्र के सानिध्य में बहुत सीखने का अवसर मिला। यहां अरुण सक्सेना, प्रतिभा कटियार प्रणय मोहन सिन्हा आदि मेरे लिये आलोक सर स्वतंत्र भारत, धर्मयुग और अनेक पत्रों में बड़ी जिम्मेदारी निभा चुके थे। संपादकीय की बारीकियों को इनसे सीखने में काफी मदद मिली।

यहां मेरे कुछ पुराने साथी रजनीश राज, अनिल मिश्र, सुबोध अग्निहोत्री, चंद्रसेन वर्मा, वेद प्रकाश यादव, सुशील सिद्धार्थ थे। इनमे अधिकतर लोग मेरे विराधी खेमे के थे। मेरे से पहले हनुमंत राव और प्रभात रंजन दीन ने इन्हें अपनी टीम में शामिल कर लिया था। मुझे शुरुआत में लोकल डेस्क पर जिम्मेदारी दी गयी। चूंकि यहां आने से पहले मुझे कम्प्यूटर पर काम करने की जानकारी नहीं थी। मेरे इंचार्ज रजनीकांत वशिष्ठ थे। वह बहुत सुलभ व सहज स्वभाव के थे। खबरों की समझ और एडिटिंग की समझ वशिष्ठ जी के साथ काम करना सीखा। खबरों का मूल्यांकन और उनकी हेडिंग और क्रासर आदि लगाना भी इसी डेस्क पर सीखा। हिन्दुस्तान में मैं एक रिपोर्टर के रूप में काम करता था।

दो तीन माह ही मैं लोकल डेस्क पर काम कर सका। इसी डेस्क पर अनिल उपाध्याय भी काम करते थे। उन्हें पंकज जी और प्रभातजी का वरदहस्त प्राप्त था। किसी खबर को लेकर मेरा अनिल से विवाद हो गया। पंकज जी ने पहली मुलाकात में ही यह पूछा था कि क्वार्क आता है मैंने कहा आता नहीं है सर लेकिन एक माह में मैं जरूर सीख लूंगा। मेरी पहली प्राथमिकता रिपोर्टिंग थी लेकिन मुझे प्रभात जी ने डेस्क पर भेज दिया। वो शायद नहीं चाहते थे कि मैं रिपोर्टिंग करूं इस लिये उन्होंने डेस्क पर भेज क्यूंकि वो संपादकीय प्रभारी थे।

मैंने अपनी रुचि पंकज जी से बतायी तो उन्होंने कहा कुछ दिन आप डेस्क का काम सीख लें बाद में रिपोर्टिंग में कर दिया जायेगा। साथ ही कहा कि आप डेस्क पर रहकर भी स्पेशल न्यूज लिखें व मुझे दिखायें छपेंगी। मुझे पंकज जी की बात जंच गयी। मुझे उनके आश्वासन से काफी बल मिला। सप्ताह में दो तीन स्टोरी छपने लगीं। पंकज जी को मेरा न्यूज लिखने का तरीका काफी पसंद आया। उन्होंने न्यूज को आर्डिनेटर हनुमंत राव को निर्देश कि वो मेरी स्टोरी को अच्छी तरह से प्रेजेंट करें। राव को इतनी बड़ी जिम्मेदारी पंकज जी के आर्शीवाद से ही मिली थी। हिन्दुस्तान में वो उप संपादक के रूप में फीचर डेस्क पर थे। इसलिये मेरे समाचार का प्रकाशन बेहतर तरीके से होने लगा। लेकिन अभी भी मुझे क्वार्क पर पेजिनेशन करना नहीं आया था। इसलिये मेरा काम प्रेस रिलीज और हाथ से लिखी खबरों का संपादन तक सीमित था।

अलबत्ता मेरा तबादला संपादकीय डेस्क पर दिया गया। वहां सुशील सिद्धार्थ प्रभारी थे। वहां सुबोध अग्निहोत्री पहले से ही थे। चूंकि मेरा कोई गाॅड फादर नहीं था इसलिये इन दोनों ने ही मेरा जमकर शोषण किया। यहां पर मुझसे केवल लेख, चिट्ठियां और फीचर की कंपोजिंग करायी गयी। कोशिश यह की जाती कि मैं ऐसा कोई काम न करूं जिससे मेरी क्रियेटिविटी लोगों के सामने आये। संपादकीय डेस्क का सारा क्रेडिट सुशील और सुबोध के नाम जाता था। उनके शोषण का एक फायदा यह हुआ कि मेरी टाइपिंग स्पीड में काफी सुधार आया। एक दिन संपादकीय विभाग में टाइपिंग का टेस्ट हुआ और मैं उसमें भी पास हो गया है। इससे भी मेरे विरोधियों में खलबली मच गयी।

उन्हीं दिनों एक घटना हुई जिससे प्रभातजी के सामने सुशील सिद्धार्थ और सुबोध की करतूतें सामने आ गयीं। हुआ यह कि सुशीलजी ने एक फीचर कंपोज करने के लिये मुझे यह कह कर दिया कि यह अर्जेंट है आज संपादकीय पर जायेगा। मैंने ये जानकर उसे प्राथमिकता के आधार पर कंपोज कर सुशीलजी को दे दिया। आगले दिन के अखबार में मैंने देखा कि वही फीचर सुबोध के नाम से छापा गया था। यह बात मुझे बहुत अखरी। सुबोध और मेरी सेम केपासिटी थी। सुशील सिद्धार्थ ने जानबूझ कर फीचर मुझसे कंपोज कराया और उसे सुबोध के नाम से प्रकाशित किया। इससे पहले भी यह दोनों मेरे से अभद्रता कर चुके थे। दोनों ही सजातीय और ब्राह्मण होने के कारण मुझे परेशान कर रहे थे। इस बात को लेकर मैंने प्रभातजी से बात कर चुका था। लेकिन इसे प्रभात जी ने गंभीरता से नहीं लिया था। इस नये प्रकरण को मैंने प्रभात जी से विस्तार से बताया तो उन्हें भी लगा कि मेरे साथ गलत किया जा रहा है। उन्हें भी सुशील सिद्धार्थ और सुबोध की साजिश समझ आ गयी। उन्होंने मुझे दो एक दिन बाद ही डाक डेस्क पर भेज दिया। इस तरह मैं मुख्यधारा में जुड़ गया।

उन्हीं दिनों सुशील जी की एक और बात सामने आयी। उन्हें यूपी के राज्यपाल विष्णुकांत शस्त्री ने सम्मानित किया उनका फोटो व खबर लोकल डेस्क पर प्रकाशित होने के लिये आया। यह जानकर प्रभात जी को सब बातें समझ आ गयीं। संपादकीय डेस्क के इंचार्ज होने की वजह से कुछ भी प्रकाशित करने का अधिकार था। उनका महामहिम जोशी के आवास पर काफी आना जाना लगा रहा। राज्यपाल शास्त्री एक संवैधानिक पद संभालने के साथ साथ एक साहित्यकार भी थे। उन्हें कविताएं और लेख लिखने का भी शौक था। सुशील जी ने संपादकीय प्रभारी होने का फायदा उठाते हुए जनसत्ता एक्सप्रेस में उनकी काफी रचनायें प्रमुखता से प्रकाशित की। इसके एवज में दिवंगत शास्त्री ने साहित्यकारों के समारोह में सुशीलजी को सम्मानित किया और बीस हजार की नकद राशि भी प्रदान की। यह बात जानने पर प्रभातजी और अन्य लोगों को सुशीलजी का असली चेहरा नजर आने लगा। वैसे सुशीलजी को एक अच्छा साहित्यकार को जाना जाता था।
आपको बता दूं कि सुशील सिद्धार्थ को मैं पहले से ही जानता था। मीठा बोल कर घात करने में माहिर थे।

इससे पहले एक थीसिस लिखने के दौरान उन्होंने मुझे धोखा दिया था। उन्होंने अपने मित्र राकेश जो लखनऊ विकास प्राधिकरण में जूनियर इंजीनियर थे के लिये ओशो विषय पर शोध करने की शुरुआत की थी उसी दौरान मैं काम की तलाश में था। उन्होंने मेरे कहा कि विनय जी आप मुझे थीसिस लिखने में मदद कर दें आपको भी कुछ आर्थिक मदद हो जायेगी। एक डेढ़ माह तक थीसिस के काम से मैं इनके साथ काम करता रहा। उन्हीं दिनों मुझे अपने बेटे का स्कूल में एडमिशन कराना था। मैंने सुशीलजी से पैसे मांगे तो उन्होंने साफ मना दिया कि राकेश जी ने आपके लिये रुपये देने से मना कर दिया है। ये दो सौ रुपये रख लें। ये भी मैं अपने पास से दे रहा हूं। इतना सुन कर मुझे काफी गुस्सा आया और सुशीलजी की फितरत समझ गया। मेरी पत्नी ने इस शख्स की ओर से सावधान रहने की सलाह दी थी। उसने कहा जो आदमी काफी मीठा बोले उससे संभल कर रहना चाहिये।

विनय गोयल की रिपोर्ट

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