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मेरे लिये पत्रकारिता के मायने

पत्रकारिता के नाम से पहले लोगों को सम्मान मिलता था। लेकिन आज के हालात में सिर्फ लोगों की निगाह में पत्रकार एक दलाल या बिना रीढ़ का जीव समझते हैं। आज के डिजिटल युग में पहली वाली बात नहीं रह गयी है। आप को भाषा विषय की जानकारी हो न हो लेकिन चेहरा लुभावना और ग्लैमरस होना चाहिये। सफल होने के लिये चिकनी चुपड़ी बातें खूब आती हों। आजकल पत्रकारिता में खासतौर से टीवी और वेब जर्नलिस्म में आपके ज्ञान की नहीं बल्कि टीआरपी लाने वाले चेहरों व ऊटपटांग विषयों की बेसिरपैर वाले विषयों का बोलबाला है। आज से पांच साल पहले इंडिया टीवी ने हाथी गधा, घोड़ा आदि जैसे कार्यक्रम दिखा कर टीआरपी बढ़ा ली और आज के समय में वो देश का विश्वसनीय तो नहीं लेकिन बिकाऊ टीवी चैनल बन चुका है। दिलचस्प यह है ऐसे कार्यक्रमों को लोग देखते भी हैं।
बात उन दिनों की है जब मैं इंटर पास कर चुका था। हमारे एक खास रिश्तेदार देश के प्रमुख अखबार में संपादकीय विभाग में अच्छे पद पर थे। उनके व्यक्तित्व से मैं बहुत ही प्रभावित हुआ। मुझे भी थोड़ा लिखने पढ़ने का शौक चर्राया। रिश्तेदार की मदद से मेरा लिखा छपने लगा। मेरा अखबारों में छपना मेरे भविष्य के लिये काफी दुखदायी साबित हुआ। ग्रेजुएशन करने के साथ साथ अब मुझ पर आमदनी करने का दबाव परिवार की ओर से पड़ने लगा था। चंूकि मैं स्वभाव से काफी स्ट्रेट फारवर्ड था। इसलिये मेरे को जाॅब करने में काफी समस्या का सामना करना पड़ा। बीस साल से भी अधिक पत्रकारिता करने के बाद यह कहा जा सकता है कि यह प्रोफेशन रईसों के शौक बनता जा रहा है। इस फील्ड में आप किसी से भी कुछ सहयोग की उम्मीद तो छोड़ ही दीजिये। हां टांग खींचने वालों की कमी नहीं है।

मुझे सहारा में जाॅब करने का मौका मिला। तब सहारा इतना बड़ा ग्रुप नहीं था लेकिन फिलहाल मैंने वहां ज्वाइन कर लिया। लेकिन तब तक मेरे अंदर पत्रकारिता का वायरस घुस चुका था। जो जाॅब था मेरे नेचर के खिलाफ था वही ऊबाऊ क्लैरिकल जाॅब। जैसे तैसे घर वालों के दबाव में नौकरी करता रहा। कुछ समय बाद सहारा ने मीडिया हाउस की शुरुआत की और मेरे लिये मुंह मांगी मुराद होने की आशा जग गयी। लेकिन सहारा का अजब कल्चर था जिस विभाग में तैनात था उसका हेड मुझे रिलीव करने को तैयार न था और मैं उसके साथ काम करने को राजी नहीं था। उस सहारा मीडिया हाउस ने लगभग एक दर्जन लोगों को मीडिया में ट्रंासफर करने चुना था। मेरा सलेक्शन होने के बाद भी मैं मीडिया हाउस में नहीं जा सका क्यों कि मेरे हेड ने रिलीव नहीं किया था। इससे मैं अपने हेड से और भी खुन्नसिया गया। लेकिन ऐसा काफी समय तक नहीं रहा। चंूकि मेरा मन अन्य विभाग में लगता नहीं था अतः कुछ समय बाद लोगों ने आजिज आ कर मेरा तबादला मीडिया के ही अकाउन्ट्स विभाग में कर दिया। यहां आकर मुझे एक फायदा यह हुआ कि मुझे अपने विभाग के लोगों के अलावा संपादकीय विभाग में काम करने वालों से मिलने का मौका मिल गया।
वहां मेरी मुलाकात वरिष्ठ पत्रकार प्रभाकर शुक्ल और अरुण श्रीवास्तव से हुई। दोनों ही लोग डेस्क के अनुभवी पत्रकार थे। वो आज भी सहारा में वरिष्ठ पदों पर जिम्मेदारी निभा रहे हैं। इन लोगों ने मुझे पत्रकारिता की सही बारीकियां समझायीं। लेख व फीचर लिखने की कला इन्हीं दोनों लोगों की प्रेरणा से मैंने सीखी। लेकिन मेरे अंदर ललक तो न्यूज लिखने और कवर करने की थी। मुझे लोगों से बात करना और घूमना बहुत पसंद था। लेकिन कहते हैं कि किसी भी फील्ड में अपने को स्थापित करने में काफी अड़चनें आती है मेरे साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ। अरुण जी का मैं विशेष तौर पर आभारी रहूंगा कि उनके प्रोत्साहन से ही मैं पत्रकारिता के पथपर पहला कदम बढ़ा सका।

सहारा के बाद जिस संस्थान ने मुझे एक पत्रकार के रूप में पहचान दी वो स्वतंत्र चेतना था। वहां मुझे उप संपादक के रूप में जिम्मेदारी मिली तीन चार माह वहां काम करने के बाद ही लखनऊ से हिन्दुस्तान का प्रकाशन शुरू हुआ। राजधानी के अनेक संस्थानों में हिन्दुस्तान जाने के लिये होड़ लग गयी। दिग्गजों के बीच अपनी पहचान बनाना इतना आसान नहीं था। लेकिन मन में तो सिर्फ हिन्दुस्तान में काम करने की इच्छा काफी तीव्र थी अतः मैंने वहां टेªनी रिपोर्टर के रूप में ज्वाइन कर लिया। ज्वाइनिंग के समय मुझे मात्र दो सौ रुपये प्रतिमाह संस्थान की ओर मिलते थे।

मालूम हो कि उस वक्त मैं लखनऊ में किराये का मकान ले कर अपने परिवार के साथ रहा करता था। परिवार में पति पत्नी के अलावा मेरा एक बेटा भी था। अनुमान लगा सकते हैं कि मेरे लिये पत्रकारिता के क्या मायने हो सकते थे। वहां मेरे संपादक सुनील दुबे जी थे। वो अपने गुस्से के लिये काफी मशहूर थे। लोग उन्हें दुर्वासा ऋषि बुलाया करते थे। उनके केबिन में जिसको बुलाया जाता तो मानो उसकी शामत आ जाती थी। लेकिन उन्होंने कभी भी किसी जूनियर को अपना निशाना नहीं बनाया। रोजाना की मीटिंग के दौरान सब लोग सिर्फ उनकी बात को ध्यान से सुनते थे। जिस किसी ने भी उनके सामने ज्ञान बघारने की कोशिश तो समझो उसकी शामत आ गयी। संपादकजी में एक खासियत थी कि वो डांट भले ही लें लेकिन कलम से किसी का बुरा नहीं करते थे। यह बात और है कि मेरा कुछ खास भला नहीं किया लेकिन नुकसान भी नहीं किया।

हिन्दुस्तान में हमारे इंचार्ज प्रभात रंजन दीन थे। खबर क्या होती है उसे सूंघने और उसे किस तरह लिखना है प्रभात जी ने मुझे सिखाई। उस वक्त जब वो हमारी काॅपी को फाड़कर फेंकते थे तब हमारे दिल पर क्या बीतती थी इसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता है। लेकिन आज मैं थोड़ा बहुत लिखना सीखा हूं उसमें प्रभात जी का अहम् योगदान रहा है। वो स्वयं भी एक प्रखर और मुखर पत्रकार हैं। यहां मैं यह बताना चाहता हूं कि मैं कभी भी उनकी गुड लिस्ट में नहीं रहा। हिन्दुस्तान से मैं 1996 से 2000 तक जुड़ा रहा। आज भी उस समय के साथियों रजनीश राज, विजय श्रीवास्तव, शील गुप्ता, अनूप सिंह, आलोक उपाध्याय, रमेश चंद्रा, अरविंद श्रीवास्तव अखिलेश सिंह, अखिलेश ठाकुर, नागेंद्र, सुभाष सिंह, महेंद्र शुक्ला आदि की यादें स्मृतियों में शेष हैं। नागेंद्र, विनय मिश्रा, संजय श्रीवास्तव, संजय कटियारयोगेश नारायण दीक्षित, नवलकांत, सुफल भट्टाचार्य, राजकुमार सिंह, ऐसे लोग थे जो मेरी काफी मदद किया करते थे।

विनय गोयल के संस्मरण पार्ट 1

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