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लड़ना है तो कुपोषण और गरीबी से लड़े

अमेरिका और कैनेडा के बॉर्डर पर एक भी सैनिक नहीं है। यही स्थिति अब यूरोपियन यूनियन के देशों की भी है |  इन देशों में अनेकों मकान ऐसे है जिनका एक हिस्सा एक देश में तो दूसरा दूसरे में | सोते वक्त सर कनाडा में तो पाँव अमेरिका |  इसी प्रकार ड्राइंग रूम फ्रांस में तो किचन जर्मनी में | यूरोप अपनी पुरानी दुश्मनी भुला कर एक हो चुका है | वहीं साउथ एशिया यानि अखंड भारत अथार्थ भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के बॉर्डर के चप्पे-चप्पे पर सैनिक या अर्ध सैनिक तैनात है, पूरा बॉर्डर कटीली बिजली तारों से कवर से | भारत पाकिस्तान के बीच पिछले 70 सालों से घोषित और अघोषित युद्ध चल रहा है | यानि सत्ता की भूख की वजह से हुए भारत पाकिस्तान के बंटवारे में कश्मीर गले की हड्डी के रूप में फंस गया |

कश्मीर के नाम पर चलने वाले इस अघोषित युद्ध पर जितना धन व्यय हुआ है , यदि वो इस अखंड भारत की जनता के स्वास्थ्य शिक्षा और कुपोषण की समस्या को ख़त्म करने पे खर्च किया जाता तो शायद ही इस क्षेत्र में गरीबी का नामों निशान बचता | पर ऐसा लगता कि भारतीय उपमहाद्वीप की दोनों देशों की सरकारें कश्मीर के मुद्दे पर उलझा कर जनता का ध्यान मूल मुद्दों से भटकाने का प्रयास कर रही है | ऐसे में सीमा इस पार और उस पार बसे नागरिकों का कर्तव्य है कि अपने-अपने देशों की सरकारों पर दबाव बनाये कि अब युद्ध नहीं शांति चाहिए | युद्ध, युद्ध की तैयारी, युद्ध की ताकत को बेलेंस करने के नाम पे युद्ध सामग्री खरीदने के लिए होने वाला समस्त व्यय अंततः जनता को ही टैक्स के माध्यम से चुकाना पड़ता है |जबकि इस देश भक्ति के मुद्दे की तरफ धयान भटका कर राजनेता जनता का ध्यान जनता के मूल मुद्दों से ध्यान भटका चुके होते है |

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सीमा के इस पार और उस पार के लोग एक दूसरे को दुश्मन समझने लगते है | जबकि सीमा के दोनों तरफ की जनता का एक साँझा दुश्मन है , और वो है इन दोनों क्षेत्र के राजनेतावों की वो नीतियां जिसकी वजह से सीमा के दोनों पार सभी बच्चों को सार्वजानिक धन से पोषित सामान स्कूली शिक्षा नहीं मिल पाती , सीमा के दोनों पार के लोगो को सार्वजानिक स्वास्थ्य की सुविधा नहीं मिल पाती , सीमा के दोनों पार के लोग कुपोषण के शिकार है , सीमा के दोनों तरफ के लोग गरीबी से पीड़ित है | सीमा के दोनों पार के लोग कुशिक्षा , कुस्वास्थ्य , कुपोषण, गरीबी से पीड़ित इस लिए है क्योकि सीमा के दोनों तरफ की सरकारे जो धन शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण एवं अन्य नागरिक सुविधावों पर खर्च करना चाहिए वो धन युद्ध, युद्ध की तैयारी , युद्ध की सामग्री खरीदने पर खर्च करती है | सीमा के इस पार और उस पार के राजनेतावोँ को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता की वो धन युद्ध पर खर्च होता है या शिक्षा, स्वास्थ्य आदि नागरिक सुविधावों को |

क्योकिं उनके बच्चे देश को पढ़ाने के लिए देश विदेश के निजी शिक्षण संस्थावों के दरवाजे खुले है | दोनों का इलाज लंदन और न्युयोर्क में होता है | दोनों के बैक अकाउंट स्विसबैंक में मिल जायेगे | अथार्थ एक दूसरे के विरोधी होने के बाद ही बहुत सी समानता है | और एक दूसरे के शत्रु मान बैठे आम नागरिक एक जैसी सामान समस्या गरीबी, गैर बराबरी, अशिक्षा, कुपोषण, स्वास्थ्य सुविधावों का आभाव से पीड़ित है | और जब तक युद्ध का माहौल रहेगा तब तक नागरिकों का साँझा शत्रु ‘गरीबी, गैर बराबरी, अशिक्षा, कुपोषण, स्वास्थ्य सुविधावों का आभाव’ सीमा के इस पार और उस पार बनी रहेगी | राष्ट्र सुरक्षा के नाम पर सरकारे युद्ध सामग्री खरीदने पर खर्च खर्च करती रहेगी | चुकीं किसी भी अर्थव्यवस्था के पास असीमित संसाधन(धन) नहीं होता | यदि सरकारे वो धन युद्ध सामग्री खरीदने पर खर्च खर्च करती है तो सीमा के दोनों पार के जन के आम शत्रु अथार्थ ‘गरीबी, गैर बराबरी, अशिक्षा, कुपोषण, स्वास्थ्य सुविधावों का आभाव’ के लिए संसाधन (धन) बचेंगे ही नहीं | और युद्ध जनता को अपने साँझा दुश्मन से भटकायें रखने का सबसे आसन साधन है | अतः आज जरूरी है कि सीमा के इस पार और सीमा के उस पार के जन एक जुट हो अपने अपने देशों की सरकारों पर दबाव बनाये कि युद्ध नहीं ‘गरीबी, गैर बराबरी, अशिक्षा, कुपोषण, स्वास्थ्य सुविधावों का आभाव’ से मुक्ति चाहिए |
नोट : ऐसी मांग सीमा के इस पार और उस पार के साँझा नागरिक संगठनों के प्रयास से ही संभव है | एक तरफा मांग घातक है। अतः हमें ज्यादा से ज्यादा नागरिक संवादों को बढ़ावा देना होगा|
युद्ध हमेशा से पूंजीपतियों के पक्ष में होता है |  पहले युद्ध की तैयारी के नाम पर संसाधनों को युद्ध सामग्री खरीदने पर खर्च किया जाता है |

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जिसका फायदा इसे बनाने से लेकर इसकी दलाली में लगे सटोरियों को होता है | गलती से युद्ध हो जाये तो सट्टे बाज जरूरी सामानों के रेट दुगने तिगुने नहीं दस गुने तक कर देते है | यानि फायदा ही फायदा | चुकीं सुरक्षा से बड़ा कोई मुद्दा नहीं. और सारे संसाधन युद्ध के नाम पर बहा दिए जाते है | अतः अब जहा तक आम जनता की बात उसके स्वास्थ्य, शिक्षा आदि विषयों पर खर्च करने के लिए संसाधन ही नहीं बचते युद्ध में जो सैनिक मरते है वो भी किसान और मजदूरों की ही संताने होती है |  न की धना सेठों की प्रथम विश्वयुद्ध से सीरिया युद्ध तक को उठा कर देख ले | युद्ध के नाम पर जो राजनीति होती है उससे मालामाल देशी विदेशी पूंजीपति, नेता (दलाली उन्हें भी जाती है ) होते है | पिसते सीमा के इस और उस पार के आम जन ही |सर्जिकल स्ट्राइक के लिए सैनिकों को बधाई |  युद्ध समस्या का समाधान नहीं |

लेखक अश्वनी सिंह के निजी विचार

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