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आम से खास बनता सोच का दायरा…

हमारा संविधान जिसे हम हमारा कह रहे हैं, क्या वो हमारा हैं? दरअसल आज के वक्त में हमारा रहा ही नहीं हैं। मुझे 2014 के पहले का दौर याद आ रहा हैं, जहां पर सरकार की आलोचना करने पर हमले नहीं हुआ करते थे। वो दौर था जहां लोग खुलकर सोशल मीडिया में अपनी आवाज रख सकते थे लेकिन आज के वक्त में हालात ऐसे हैं कि आप जैसे ही सरकार के विपक्ष में बोलने लगते हो तो कुछ एक तबका आके आपको चुप कराने की कोशिशों में लगा रहता हैं, या तो आप पर प्रहार होने लगते हैं। गुलामी का एक लम्बा इतिहास हम सबके अतीत से जुड़ा हुआ हैं, इसीलिए हम सब अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं। कोई लिखकर अपना विरोध दर्ज करा रहा हैं, तो कोई बोलकर लेकिन इसका कदापि यह मतलब नहीं हैं कि हम लोग हिंसक हो गए हैं।

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हम जिस मुल्क में रहते हैं उसको हम हिंदुस्तान कहते हैं यानि कि जो हिंद से बढ़कर हैं, जहां पर किसी की आजादी का हनन नहीं किया जाता हैं लेकिन महज यह बाते आज के वक्त में बोलने तक ही सीमित रह गई हैं। आज के समय अगर आप सोशल मीडिया में सरकार के खिलाफ कुछ लिख देते हैं तो आप पर इतनी ज्यादा जुबानी मार की जाती हैं कि आपको लगता हैं कि क्या हम इस मुल्क के हैं ही नहीं या फिर हम इस मुल्क के हित के लिए नहीं बल्कि अहित के लिए लड़ रहे हैं क्या। अरे भाई इस मुल्क को कुर्बानियों के जरिए बनाया गया हैं इस मुल्क कीआजादी को तुम मत छीनों क्योंकि जिस दिन इसका एहसास होगा वक्त बहुत आगे बढ़ चुका होगा।

मुझे ऐसी स्थिति को देखकर आशुतोष राणा साहब की लिखी कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं कि,

देश चलता नहीं है, मचलता है,

मुद्दा हल नहीं होता सिर्फ उछलता है,

जंग मैदान पर नहीं, सोशल मीडिय़ा पर जारी है,

आज तेरी, तो कल मेरी बारी है…

हमारा हिन्दुस्तान जिसे हम चाहकर भी हमारा बोलने से डरते हैं क्योंकि वो पिछले कुछ एक दशक से बंटा हुआ हैं। कभी जाति के नाम पर, तो कभी धर्म के नाम पर। जहां हमने महिलाओं को घर के बाहर निकलने ही नहीं दिया। ऐसे मुल्क में लोकतंत्र को संजोकर रखना जरा मुश्किल का काम लगता हैं और हमारी विडम्बना ये रही है कि, हमने कभी भी बराबरी की बात की ही नहीं। जिस संविधान के तहत हम freedom of speech यानि कि बोलने की आजादी का जिक्र  करते हैं, आज के दौर पर उस उठती हुई आवाज को दबा दिया जाता हैं। तो क्या ऐसे में आपकी आवाज सरकार तक पहुंच रही हैं?

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अगर आपकी आवाज सरकार के कानों में पहुंच रही हैं तो कृपया करके सरकार से कहें युवा भारत में सोशल मीडिया में बोले जाने वाली ताकत को हमसे न छीना जाए ताकि हम अपनी बात खुलकर रख सके। चाहे वो सरकार के समर्थन में हो या फिर विरोध में। समर्थन करने पर तो हमें इतनी दुआएं दी जा रही हैं कि पूछिए मत लेकिन विरोध किया तो हमें सीधे तौर पर राष्ट्रद्रोही कह दिया जाता है। राष्ट्रद्रोही नही हैं हम, बल्कि राष्ट्रद्रोही वो लोग जरूर हो सकते हैं, जो जनता का हक मार कर महंगी-महंगी गाड़ियों में सफर करते हैं, हेलीकॉप्टर से घूमते हैं और कोई घटना घट जाने पर दो आंसू बहाकर आश्वासन जता देते हैं।

आज के वक्त को देख कर लग रहा है कि सूर्य अस्त हो गया हैं पर तारों की रोशनी में हमें राह तलाशनी हैं। जहां अंधकार तो निहित है लेकिन कुछ एक रोशनी तारों की दिखती है जिसे बुझाने का प्रयास किया जाता हैं। आज मौका ढूढ़ा जा रहा हैं कि किसी तरह से उस आवाज को खत्म कर दें जो किसी के हित में उठने का प्रयास कर रही हैं।

लेखक अनुराग गुप्ता के निजी विचार…

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