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बेसहारा हो गया…

बेसहारा

हरे भरे बाग का बागवां

बेसहारा हो गया,

उम्मीदों में लगा पेड़

अब बड़ा हो गया,

छांव के लिये तरसता बागवां

बेसहारा हो गया,

खून पसीने से सींचा पेड़

अब वो खड़ा हो गया,

फल खाने के समय बागवां

बेसहारा हो गया,

चार दीवारियों से घिरा पेड़

अब हरा भरा हो गया,

बाग के बाहर खड़ा बागवां

बेसहारा हो गया,

मुसीबतों से बचाया जो पेड़

अब बड़ा हो गया,

खुशियों के लिये रोये बागवां

बेसहारा हो गया , 

~ एस. प्रसाद 

aashuकविता का सार

यह कविता उस मां-बाप के लिये है जो अपने बच्चों के पालन पोषण में किसी भी तरह की कमी ना करते हुए, उन्हें बड़ा करते हैं और जब वो बड़े हो जाते हैं, तो अपने ही मां-बाप को अपनी खुशियों में शरीक करने से कतराते हैं और वो मां-बाप अपने आप को बेसहारा महसूस करने लगते हैं। तो इस कविता के माध्यम से हम यह बताने की कोशिश कर रहे हैं, कि हर मां-बाप के लिये उनके बच्चे पेड़ की तरह, उनका आंगन बगीचे की तरह और मां-बाप खुद को बागवां की तरह प्रस्तुत करते हैं। जिस तरह से मां-बाप हमारे दर्द को समझते हैं, बूढ़ापे में हम भी उनके दुख-दर्द को वैसे ही समझें, तो दुनिया खुशहाल बन जाएगी।

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