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लाचार मम्मा की उम्मीद…

गोधुली बेला में चला गया, खेल खेलने टोली

सूरज चाचा चले गये तो, लगा डराने टोली,

चंदा मामा निकल गये फिर, लगा झूमने टोली

ढूंढते-ढूंढते मम्मा पहुंची, बोले प्यार की बोली,

गले लगाके मम्मा, देखन चाहे मुखड़ा चोरी

मम्मा की ममता प्यार से, बोले प्य़ारी बोली,

समझ ना आया क्यों बोली, वचन दुलारी बोली

सूरज चाचा छुप गये पर, चांदनी रात हुई चकोरी,

चंदा मामा लेट हुए तो, डर जाओगे प्यारे अंधयारी 

गोधुली बेला में छोड़ दे, खेल खेलने की तैयारी,

आस लगा कर राह देखती, हो गई खड़े-खड़े बेचारी

सूरज चाचा छुप गये तो, कर लेना घर आने की तैयारी,

मम्मा की ममता राह देखती, हुई आस में लाचार बेचारी…

swing~ एस प्रसाद

यह कविता उन बच्चों पे आधारित है जो शाम की गोधुली बेला में घर से खेलन के लिये निकल जाते हैं। अंधेरे की परवाह किये बिना भी घर से बाहर खेलते रहते हैं। मां इंतज़ार करते-करते अपने बच्चे को ढूंढने बच्चों की टोली में जाती है और प्यार से गले लगाते हुए उसे समझाती है कि बेटा शाम ढलने से पहले घर आ जाया करना क्योंकि तुम्हारी मम्मा खड़े-खड़े बेचारी की तरह तुम्हारा इंतज़ार करती है।   

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