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विपक्ष के चक्रव्यूह को कैसे भेद पायेगी मोदी एण्ड कंपनी

नयी दिल्ली। 2018 में मोदी सरकार का कार्यकाल खत्म होने जा रहा है। यह कार्यकाल जैसा भी रहा हो लेकिन बीजेपी और सरकार के मंत्रिगण इसे स्वर्णकाल से कम नहीं मानते हैं। उनकी मानें तो मोदी और उनकी सरकार ने देश को फर्श से अर्श पर पहुंचा दिया है। ये बात दूसरी है कि विपक्ष केन्द्र सरक ार को हर पहलू पर विफल मान रही है। इसी लिये कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दल सरकार और पीएम मोदी पर हमलावर है। इतना ही नहीं एनडीए के कुछ घटक टीडीपी, हिन्दुस्तान अवाम पार्टी के साथ लोजपा और उपेंद्र कुशवाह के भी सुर में बगावत की बू आने लगी है। ममता बनर्जी अपने गढ़ में सेंध लगाती भाजपा को धकेलने के लिये अन्य विपक्षी दलों को लामबंद करने के प्रयास में जुटी हुईं है। बीजेपी भी इन हालातों से अनभिज्ञ नहीं है। इसीलिये आगामी आम चुनाव के लिये उन प्रदेशों में पैठ बनाने के लिये कवायद में जुटी हुई है।

जब से अमित शाह ने बीजेपी की कमान संभाली है उन्होंने संगठन को मजबूत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। यही वजह है कि यूपी में आम चुनाव के बाद विधानसभा चुनाव में भी पार्टी को ऐतिहासिक सफलता हाथ लगी है। इसमें शाह की रणनीतिक और राजनीतिक कौशल के योगदान को कमतर नहीं आंका जा सकता है। केवल बिहार व प. बंगाल के चुनाव में मोदी शाह की जोड़ी वो कमाल नहीं कर सकी जो उसने हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड, गुजरात अन्य प्रदेशों में जलवा दिखाया था। वर्तमान में 23 प्रदेशों की सत्ता की कमान बीजेपी और उनके सहयोगी दलों के हाथों में है। अमित शाह एक प्रदेश के चुनाव संपन्न होने के बाद दूसरे प्रदेशों में पार्टी को मजबूत करने के मुहिम में जुट जाते हैं।

फिलहाल शाह उन प्रदेशों में पार्टी के प्रचार अभियान को गति देने में लगे हैं जहां बीजेपी का वजूद नहीं है। इन प्रदेशों में प. बंगाल, तमिलनाडु, केरल, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना को लक्ष्य बनाया गया है। अमित शाह ने अपनी रणनीति के अंतरगत केन्द्र सरकार में मंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेताओं की टीमें बनायी हैं जो इन प्रदेशों की प्रत्येक संसदीय क्षेत्र में सघन दौरा करने के साथ केन्द्र की योजनाओं को जन जन तक पहुंचाने का प्रयास करेंगी। इसके साथ कुछ टीमें उन संसदीय क्षेत्रो ंमें जायेंगी जहां पार्टी का उम्मीदवार पिछले आम चुनाव में दूसरी पोजिशन पर रहा था।

राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो भाजपा और उनके सहयोगी दलों के लिये पिछले बार की तरह विजय अभियान की पुरावृत्ति संभव होती नहीं दिख रही है। मोदी सरकार के चार साल के कार्यकाल में लोग नोटबंदी, जीएसटी, बेरोजगारी, आर्थिक सुधारों और बैंकिंग प्रणाली से आम जनता काफी परेशान हुई है। पिछले आम चुनावों से सीख लेते हुए कांग्रेस भी काफी सक्रिय दिख रही है। क्षेत्रीय पार्टियों में सपा, बसपा और कांग्रेस केन्द्र सरकार को घेरने में लामबंद हो सकते हैं। जैसा कि यूपी के उप चुनावों में सपा बसपा के गठबंधन से भाजपा को दो लोकसभा चुनावों में जीती हुई सीटें गंवानी पड़ी है। इससे विपक्ष यह समझ रहा है कि भाजपा को अलग रह कर हराना संभव नही ंहै इसलिये विपक्षियों को एक होना ही पड़ेगा।

विनय गोयल की रिपोर्ट

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