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संवेदनहीन होते राजनेता…

गुरुग्राम के रेयान इंटरनेशनल स्कूल में प्रद्युम्न की हत्या और उसके ठीक अगले ही दिन दिल्ली के टेगौर स्कूल में 5 साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म की घटना ने आम आदमी को अंदर तक हिला कर रख दिया है। आम आदमी इन हादसों के बाद से इतना आहत हुआ है कि सोशल मीडिया से लेकर नेशनल मीडिया में बवाल मचा हुआ है। अभिभावक चिंता में पड़ गए हैं कि अब बच्चे कहीं सुरक्षित नहीं। इस स्थिति में अभिभावक करें तो करें क्या?

इन दो बड़े मामलों से चंद दिन पहले बैंगलोर में एक वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या, कोई भी मामला ले लीजिए सरकारें चुप हैं। अपने राजनीतिक एजेंडे सेट करने से किसी को फुर्सत मिले तब तो साहब कोई अपनी प्रतिक्रिया दे। सरकारों को क्या होता जा रहा है, क्यूं लोग संवेदनहीन होते जा रहे हैं, समझ से परे है। पिछले कुछ दिनों से अपराध की कुछ बड़ी ख़बरें ऐसी हैं जिन पर अपना स्पष्टीकरण देने के लिए सरकार को आगे आना चाहिए था लेकिन सरकारें मौन हैं। फिर मामला चाहे वर्णिका कुंडू के साथ हुई घटना का हो, गौरी लंकेश की हत्या का हो या हाल ही में एनसीआर में घटित हत्या व दुष्कर्म का हो।

वर्णिका कुंडू के केस में तो हरियाणा भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष रामवीर भट्टी ने पीड़ित लड़की पर ही कीचड़ उछालना चाहा, उनका बयान कुछ ये था-

“वह महिला इतनी रात को बाहर क्यों घूम रही थी? मां-बाप को अपने बच्चों का ख्याल रखना चाहिए। उन्हें रात को अकेले बाहर घूमने की अनुमति नहीं देनी चाहिए। बच्चे समय से घर आएं, उनका रात को बाहर रहने का क्या मतलब?”

अपनी राजनीति छवि न बिगड़ने पाए इसके लिए कई बार तो राजनेता लोग बेतुके बयान भी देते हैं। लेकिन आखिर में मीडिया द्वारा उनका झूठ पकड़ा भी जाता है। ट्विटर पर हमेशा एक्टिव रहने वाले राजनेता भी आजकल गायब हैं। किस-किस घटना को छोड़ें व किसको शामिल करें, ताजा मामलों की फेहरिस्त बहुत लंबी है। गोरखपुर बीआरडी मेडिकल कॉलेज की घटना को ही ले लिया जाए, सरकारें बातें बना-बनाकर शांत हो गईं लेकिन क्या कोई ठोस कदम नही उठाया गया।

नेता पक्ष का हो या विपक्ष का कोई भी अपनी भूमिका सही तरीके से नहीं निभा रहा है। रेप, मासूमों का कत्ल हो या किसी पत्रकार की हत्या का मामला सभी कन्नी काटते नजर आते हैं। संवेदनशील मामलों में विपक्ष जोरदार ढंग से अपनी प्रतिक्रिया जाहिर नहीं करता है। आम आदमी से सीधा जुड़ने वाला मुद्दा पेट्रोल-डीजल के दामों में भारी इजाफा है। लेकिन सत्ताधारी दल और उसके मंत्री तो केवल नमो नमो के गुणगान में लगे हैं। वही विपक्ष भी इस मामले में लचीलापन अपनाये हुए है। याद करिये जब कांग्रेस की सरकार केन्द्र थी तो रसोई गैस के दामों में बढ़ोतरी को लेकर भाजपा ने पूरे देश में भारत बंद का आयोजन कर सरकार के लिये परेशनियां खड़ी कर दी थीं। आज के समय में पेट्रोल 60 से 80 रुपये पहुंच गया है लेकिन कांग्रेस के कानों में जूं भी नहीं रेंग रही है। विपक्ष के नकारेपन का फायदा भाजपा व मोदी ने उठा कर सत्ता पाने में सफलता प्राप्त की थी। कांग्रेस ने इसके बावजूद पिछली हार से सबक नहीं लिया है।

अब उन लोगों को ये भी कोई और बताएगा क्या कि सिर्फ खेद जताना ही आपका काम नहीं है, कुछ बदलाव तो लाइए, कोई ठोस कदम उठाइए तब तो बात बने। खेद जताने पर मामला खत्म नहीं होता बल्कि वहां से तो आपकी शुरू होती है।

गोरखपुर मामले की न तो किसी ने जिम्मेदारी ली, बजाय इसके घटना का ऊल-जुलूल कारण बताया जाता रहा। मंत्रियों को बयान भी कुछ ऐसे थे-

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने कहा- इतने बड़े देश में बहुत सारे हादसे हुए हैं और ये कोई पहली बार नहीं हुआ।

यूपी के स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थ नाथ कहना था कि ‘ अगस्त महीने में बच्चे मरते ही हैं’। क्या ये संवेदनहीनता नहीं है?

गौरी लंकेश की हत्या पर कुछ कहना तो दूर उनकी मौत के बाद उनको कुतिया कहने वाले शख्स को प्रधानमंत्री ट्विटर पर फॉलो करते हैं। इतना बवाल होने के बाद भी पीएम ने न तो कोई सफाई दी न ही उस शख्स को अनफॉलो किया। इसके बाद रेयान इंटरनेशनल स्कूल में प्रद्युम्न की हत्या, क्यूं और कैसे का कुछ पता नहीं। सरकारें यहां भी चुप थीं लेकिन जब मामले ने तुल पकड़ी तो खट्टर सरकार को सामने आना पड़ा, यदि हो सकता तो वो यहां से भी बच निकलना चाहते थे।

अपनी राजनीति छवि को साफ-सुथरा रखने के लिए ये लोग किसी भी बात को नकार सकते हैं और अपने राजनैतिक फायदे के लिए रामरहीम जैसे कुकर्मी के आगे झुक सकते हैं। आमजन की फिक्र होती तो सब लोग इस तरह चुप ना होते, कोई तो आगे आकर उसके खिलाफ बोलता। लेकिन सब चुप हैं।

ये बयानबाज़ी, ये राजनैतिक लड़ाई और कुर्सी पर कायम रहने की कोशिश विकास के लिए तो नहीं है। विकास के लिए होती तो कहीं तो कोई बदलाव नज़र आता। पिछली केन्द्र सरकार से लोगों को शिकायत थी कि हमारे प्रधानमंत्री बोलते नहीं थे। अब हाल ये है कि हमारे प्रधामनंत्री बोलते तो हैं लेकिन कोई बदलाव नज़र नहीं आता, तो ऐसा बोलना भी किस काम का !

माननीय प्रधानमंत्री से दरख्वास्त है कि हमें भूतपूर्व प्रधानमंत्री को याद करना पड़े ऐसा वक्त ना लायें। वो बोलते नहीं थे तो झूठ भी नहीं बोलते थे।

उपेन्द्र वशिष्ठ के निजी विचार…

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