Home / खुला खत / पत्रकारिता के मायने पार्ट 2- पत्रकारिता के खट्टे मीठे अनुभव
journalism-concept

पत्रकारिता के मायने पार्ट 2- पत्रकारिता के खट्टे मीठे अनुभव

पत्रकारिता की दूसरी पाठशाला मेरे लिये जनसत्ता एक्सप्रेस रहा। यहां प्रवेश करना भी मेरे लिये काफी संघर्षपूण रहा। 2001 यूपी की राजधानी से इस अखबार के प्रकाशन के लिये इंडियन एक्सपे्रस समूह ने विराज प्रकाशन से करार किया। विराज प्रकाशन ने संपादकीय विभाग की जिम्मेदारी दिवंगत वरिष्ठ पत्रकार घनश्याम पंकज जी को सौंपी। पंकज जी अपने तौर तरीकों ंऔर शान शौकत के लिये विख्यात थे। मैंने भी पंकज जी से संपर्क किया लेकिन उन्होंने गोलमोल ढंग से टरका दिया कि उनके यहां तो भर्तियां पहले ही हो चुकी है। उनकी बातों को सुन कर काफी निराशा हुई। लेकिन मैंने तो मन ही बना लिया था कि इस अखबार में तो काम करना ही है।

लखनऊ हिन्दुस्तान में वरिष्ठ पत्रकार रवींद्र जायसवाल हमारे एक करीबी के अच्छे जानकार थे। इत्तेफाक से उनसे मुलाकात हुई और उन्होंने राकेश कुमार जी का जिक्र किया और कहा कि उनसे मिलो तुम्हारी बन सकती है। काफी जोर ए मशक्कत के बाद राकेश जी से भेंट हुई। राकेश जी ने मुलाकात के दौरान अच्छा बर्ताव किया। मुझे भी काफी तसल्ली मिली कि किसी ने तो हिम्मत बंधाई।

अगल दि नही मुझे यह संदेशा मिला कि पुराने किले में दोपहर में पहुंच जाना डाक्टर साहब से मुलाकात का समय तय हुआ है। अखिलेश दास को लोग डाक्टर साहब कह कर बुलाते थे। अगले दिन जब मैं साइकिल से उनकी कोठी पर पंहुचा तो वहां दरबारियों की भीड़ देख कर मेरे हौसले पस्त हो गये। लगा कि यहां भी कोरा आश्वासन ही मिलने वाला। मैं भी मुलाकातियों की भीड़ में शामिल हो गया। लेकिन अभी बैठ कर सांस भी नहीं ली थी कि मेरे को डाक्टर साहब से मिलने का बुलावा भी आ गया।

एक गार्ड मुझे डाक्टर साहब के तीन मंजिल स्थित कमरे में मिलाने ले गया। डाक्टर साहब एक लांग चेयर पर बैठे थे। मुझे देख कर बोले कुछ लिखना पढ़ना आता है। मैंने शांत लहजे में जो कुछ थोड़ा बहुत हिन्दुस्तान में सीखा था सिलसिलेवार बता दिया। उन्होंने पूछा कि कुछ प्रकाशित लेख और समाचार लाये हो। मैंने ना में सिर हिलाते हुए कहा कि अब तक जितनी जगह काम के लिये बुलाया जाता था सब जगह सब कागजात ले जाता था वहां से सिर्फ आश्वासन ही मिलते थे। इसलिये आज कुछ भी नहीं लाया। इतना सुन डाक्टर साहब हल्का सा मुस्कराये लेकिन बोले कुछ भी नहीं। बगल में तिपाई पर रखे फोन को उठा कर सिर्फ इतना बोले कि पंकज को फोन लगाओ। मैं तब भी नहीं समझा कि यह फोन घनश्याम पंकज जी को लगाया जा रहा था। फोन लगते ही डाक्टर साहब ने इतना कहा कि विनय गोयल आपके पास कल आ रहे हैं। इन्हें रखना है। इतना कह कर उन्होंने मेरी ओर ध्यान से देखा और कहा कि कल जाकर दफ्तर में पंकज से मिल लेना और हां काम दिल लगा कर मेहनत से करना कोई परेशानी हो तो मेरे से फिर मिलना।

मैंने सिर झुका कर उनका अभिवादन किया और अनुमति ले कर उनके कमरे से बाहर आ गया। मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि मुझे जनसत्ता में काम करने का मौका मिल गया है। मैं खुशी में साइकिल चला कर अपने गोमती नगर स्थित घर पर पहुंचना चाहता था। उन दिनों मैं आर्थिक रूप से काफी परेशान था। उस समय मेरे परिवार में पत्नी और दो बच्चे थे। एक बच्चा पढ़ने जाता था। उस दिन डाक्टर साहब मेरे लिये भगवान के रूप में दिख रहे थे। उस दिन हमारे परिवार में काफी खुशी का माहौल था। सारा परिवार इस बात से खुश था कि उनका परिवार अब आर्थिक संकट से उबर सकेगा।

अगले दिन मैं अपने घर से 12 बजे तक पंकज जी से मिलने के लिये निकल गया। वहां पहुंच कर रिसेप्शन के पास पड़ी कुर्सी पर बैठ कर इंतजार करने लगा। पंकज जी आफिस अभी नहीं आये थे अतः मैं निश्चिंत था कि जब आयेंगे तो मेरी मुलाकात हो जायेगी। लगभग आधे घंटे बाद संपादक जी आ गये और आते ही सबसे पहले ही मेरे से मिलने की इच्छा जतायी। मैं संपादकीय कक्ष में अन्य साथियों से मिलजुल रहा था। इनमें से कुछ मेरे हिन्दुस्तान के साथी थे। कुछ लोग खुशी का इजहार कर रहे थे तो कुछ लोग मुझे वहां देखकर हैरान हो रहे थे कि विनय यहां कैसे आया।

आफिस आते ही पंकज जी अपने केबिन में चले गये और चपरासी को मुझे बुलाने के लिये कहा। चपरासी मुझे खोजते हुए एडिटोरियल मंे आ गया। उसने वहां लोगों से पूछा कि विनय गोयल कौन है। उनको पंकज जी ने अपने केबिन में बुलाया है। इतना सुनना था कि संपादकीय विभाग में सन्नाटा छा गया। सब मेरी तरफ हैरानी से देख रहे थे। देखते भी क्यों न जो पंकज जी किसी से मिलने के लिये इतने बेताब नहीं होते थे आज विनय गोयल से क्यों मिलने को बेकरार हैं। इतनी देर में लोगों का बर्ताव मेरे से बदल गया। जो मेरे से मिलने में अपनी तौहीन समझ रहे थे आगे बढ़ कर गले लग रहे थे। बधाइयां देने लगे। लेकिन मैं वहां से तुरंत निकल कर पंकज जी से मिलने उनके केबिन में पहुंच गया।

किसी का पंकज जी से मुलाकात करना आसान होता था। लेकिन मैं जैसे उनके केबिन के पास पहुंचा पंकज जी ने मुझे अंदर बुला कर बैठने का इशारा किया। पंकज जी अपने केबिन में बैठकर अखबार देख रहे थे। उन्होंने मुझे देख कर कहा विनय जी मेरे पास डाक्टर साहब का फोन आया था। आप आज से ही ज्वाइन कर लें और आपका लैटर आज ही आपको मिल जायेगा। कोई दिक्कत या परेशान हो तो आप किसी समय मेरे से मिल सकते हैं। मैं पंकज जी के व्यक्तित्व से काफी प्रभावित था। उनके इस तरह के रवैये से और ज्यादा कायल हो गया।

उन्हीं में प्रभात जी और हनुमंत राव भी थे जो नहीं चाह रहे थे कि मैं यहां आने में सफल रहूं। जब कि मैं इन दोनों से ही पूर्व परिचित था। दोनों ने ही मुझे टका सा जवाब दे दिया। इससे पहले मैंने प्रभातजी और राव जी से जाॅब की दरख्वास्त की थी। लेकिन इन लोगों ने कोई भी मदद करने से साफ मना कर दिया। राव ने कहा कि तुम्हारे पास कोई पत्रकारिता की डिग्री नहीं है अतः यहां तुम्हारा नहीं हो सकता है। यहां हर काम आॅन लाइन होना है और तुम्हे कंप्यूटर भी नहीं आता है। इन लोगों की बातें सुन कर मैं एकदम निराश हो चुका था। लेकिन डाक्टर साहब से मुलाकात होने के बाद मेरा आत्मविश्वास काफी बढ़़ गया था।

डाक्टर साहब कांग्रेस की सरकार में इस्पात राज्य मंत्री हुआ करते थे। इससे पहले कांग्रेस की तरफ से राज्यसभा के सांसद भी रह चुके थे। उन्होंने ही राजधानी में विराज प्रकाशन के जरिये इंडियन एक्सप्रेस व जनसत्ता एक्सप्रेस का प्रकाशन शुरू किया था। इस अखबार की चर्चा प्रकाशित होने से पहले ही काफी चर्चा में आ चुका था। प्रदेशभर के नामचीन पत्रकार इससे जुड़ने का प्रयास कर रहे थे। हिन्दुस्तान, राष्ट्रीय सहारा, स्वतंत्र भारत, जागरण और अमर उजाला जैसे अखबारों के पत्रकार विराज प्रकाशन से जुड़ चुके थे। उनके साथ काम करने की बात सोच कर ही मैं काफी रोमांचित हो रहा था।

जनसत्ता में संपादकीय के इंचार्ज घनश्याम पंकज जैसे मूर्धन्य पत्रकार कर रहे थे जिनको देखने के लिये लोग तरसते थे। वहीं प्रभात रंजन दीन, रवींद्र सिंह, सुरेश बहादुर सिंह, आलोक सर, हनुमंत राव, अनिल सिन्हा, प्रतिभा कटियार, अरुण सक्सेना, सुशील सिद्धार्थ व अनिल भारद्वाज जैसे दिग्गज पत्रकारों की लंबी चैड़ी टीम थी।

विनय गोयल के विचार

Next9news

Check Also

subrat

सपनों का सौदागर सुब्रत राॅय सहारा

पिछले तीन साल से सहारा समूह पर सेबी की वक्र दृष्टि है। दो साल तक …