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नादान इश्क़…

लरजते लम्हों से दिल की बातें, कह ना सका

नैनों का इशारा था, इजहार कर ना सका,

उसकी आंखों की चाहत, दिल सह ना सका

चाहत को रूसवाईयों के, डर से कह ना सका,

चली गई तन्हाईयों में, जुदाई सह ना सका

लरजते लम्हों से दिल की बातें, कह ना सका,

छुप-छुप के वो देखती रही, समझ ना सका

नादानी का आलम था, जो कदम बढ़ ना सका,

कर गई आंखों का इशारा, अनदेखा कर ना सका

थाम लेता हाथ को मगर, मुमकिन हो ना सका,

लरजते लम्हों से दिल की बातें, कह ना सका

रोक देता वक्त को वहीं पे, मगर समझ ना सका,

हो गई किसी और की हमसफर, यकीन कर ना सका

आंसू का समंदर आंखों में लिये, आह भर ना सका,

आज भी हर पल याद करूं कि कुछ कर ना सका

~ एस प्रसाद

कविता का सार

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इस कविता के माध्यम से उस व्यक्तित्व को सामने लाने की कोशिश की गई हैं, जो अपने चाहत को खोने के डर से दिल की बाते दिल में ही दवा देते हैं। वक्त का इशारा उन्हें बार-बार कुछ कहने का मौका तो देता हैं, लेकिन वो कह नहीं पाते। जब तक उन्हें अहसास होता हैं, तब तक उनके हाथों से बहुत कुछ निकल चुका होता हैं। आखिर में अपनी नादानी पे पश्चाताप के अलावा कुछ नहीं होता, चाहे हमारे जीवन की सफलता या हमारे हमसफर की बात ही क्यों न हो। वक्त का इजहार ही हमें पश्चाताप पे मजबूर नहीं करता।

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