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नोटबदली कालाधन खत्म करेगी, या मंदी लाएगी?

कोई भी कालाधनधारक कैश/नकदी मुख्यतः तात्कालिक उपभोग जरूरतों और लाभदायक सौदों पर खर्च करने भर के लिए रखता है। लाभदायक सौदे जैसे जमीन, सोना-चाँदी, हवाला के माध्यम विदेशी बांड में निवेश कर कैश के बोझ से मुक्त हो जाता है। कालाधन पैदा करने की भी एक प्रक्रिया है,  जो कैशलैश भी होती है। जी हाँ! कैशलैश इकॉनमी भी ‘ब्लैक’ हो सकती है।

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काली कमाई का मतलब नकद रुपए का संग्रहण कर उसके ऊपर ‘घाघ’ की तरह बैठ जाना नहीं, बल्कि उसे को और अधिक गति देना है। हमें समझना होगा कि ‘वाइट एक्टिविटीज’ की तरह ‘ब्लैक एक्टिविटी’ बचा-बचा कर खर्च नहीं की जाती बल्कि और अथिक अंधी कमाई के लिए झोक दी जाती है। मुख्य बात यह है, कालिख धंधा एवं रिश्वत खोरी करने वालो की मोटी कमाई से प्राप्त नगद-मुद्रा भी विनिमय माध्यम जिसका कुछ अंश नकद-मुद्रा के रूप में संचित रह जाता है, शेष पूंजी-संपत्ति के दूसरे रूपों में परिवर्तित हो कर और अधिक धन पैदा करती है। काला-धन जमा करने वालों का काला-धन सिर्फ नगदी में नहीं है। रुपया तो उस काले-धन के मूल्य को आंकलित करने की ईकाई भर है। नगदी में तो उसका अंश भर भी नहीं बचता है। ये खुद रिजर्व बैंक के नोट जमा करने के संदर्भ में आ रहे आंकड़े बता रहे है।

वही एक दिहाड़ी करने वाले व्यक्ति, जिसका विविध कारणों से बैंक में अकाउंट नही है। या है भी तो दिहाड़ी छोड़ बैंक में जाने की दिक्कत से, उसका 100% संचित धन नगद-मुद्रा में ही है। नगदी पर की गयी सर्जिकल स्ट्राइक में वो ही मरा है। आपकी सरकार जहाँ कैश के केस में 50 हजार रुपये से ऊपर जनधन में और 2.5 लाख से ऊपर समान्य खाते में जमा करने पर जबाब देना होगा । एक पुरुष और एक विवाहित स्त्री और दो लड़कियों वाले परिवार में एक किलो सौ ग्राम सोना कानून जायज । मतलब सोने के रूप में जमा धन पर लगभग 33 लाख रुपये तक उससे कोई पूछ-ताछ नहीं की जाएगी पुस्तैनी जायदाद दिखा कर यह सीमा और अधिक बढ़ाई जा सकती है । ये कैसा दौहरा मापदंड है, श्रीमान।

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विमुद्रिकरण ने एक प्रकार से लोगों पर दबाव डाल कर अर्थव्यवस्था में जबर्दस्ती की बचत पैदा की है। जैसा कि अर्थशास्त्र का सिद्धान्त है कि यदि समस्त समाज की बचत बढ़ती है और वह किए जाने वाले निवेश से कम रह जाती है तो अर्थव्यवस्था में अधिबचत के गुणक के बराबर आर्थिक मंदी पैदा करेगी।

लेखक-अश्विनीकुमार ‘सुकरात’,

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