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नोटबंदी कालेधन का समाधान या फिर कालेधन पे सवाल

8 नवम्बर से पहले किसी ने सोचा नहीं था की उनके पास जो पैसा है वह आने वाले दिनों में उनकी परेशानी का सबब बनने वाला है, और काला धन को रखने वालों के यहां तो जैसे भूचाल आ गया। प्रधानमंत्री का यह फैसला काले धन को रोकने के लिए था, मगर जिनकी नींद इस पैसे ने उड़ाई उन्हें कहां चैन मिलना था तो बस कोशिश में लग गए की कैसे इससे बचाया जाये। 50 दिन का वक्त हर दिन के साथ ख़त्म होने वाला है,  मगर बैंको के बाहर लंबी-लंबी कतारें हैं और तरसती निगाहें बेसब्री से पैसे का इंतज़ार कर रही हैं और जहां बैंक के बाहर लोग घंटों इंतज़ार करने के बाद भी पाई -पाई के लिए तरस रहे है वहीं दूसरी और ऐसा भी है कि पूरे देश में भारी मात्रा में नए नोट पकडे जा रहे हैं।

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अब यह तो उन लोगों के साथ किसी मज़ाक से कम नहीं जिनको घंटों क़तारों में इंतज़ार करने के बाद भी खाली हाथ लौटना पड़ रहा है।   देश का कोई भी कोना हो, दिल्ली चाहे मुंबई या फिर कर्नाटक या और कोई हिस्सा हो, सैकड़ों के नहीं बल्कि करोड़ों के नोट जब्त हो रहे हैं। भले ही यह आयकर की कामयाबी है मगर करोड़ों रुपये का यह कालाधन नोटबंदी पर कई सवाल खड़ा करता है।  सबसे पहले तो जहां आम लोग एक-एक नोट के लिए तरस रहे हैं थे तो वहीं ऐसे में काला धन को रखने वाले वालों के पास इतनी मात्रा में नए नोट कैसे पुहंच रहे हैं,  क्या बैंक अधिकारियों की मिली-भगत से ऐसा हो रहा है या फिर इस में बड़े रसूकदार अफसर और राजनेता भी शामिल हैं।

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नोटबंदी के कुछ दिन बाद से ही देश के अलग अलग हिस्सों से 500-2000 नए नोटों की खेप मिलना शुरू गया था। देश में पुराने नोटों के बदले नए नोटों का कारोबार भी शुरू हो गया है। कुछ प्रतिशत के कमिशन पर ऐसा आसानी से हो रहा है,   कुछ और पहलूओं पर भी सोचने समझने की ज़रूरत है, यहां यह बात किसी के समर्थन या विरोध की नहीं बल्कि ये बात देश की है, नोटबंदी के बाद अर्थशात्रियों ने भी इसके बुरे परिणाम के बारे में चिंता जाहिर की है। वर्ल्ड एजेंसी ‘फिच’ के मुताबिक आने वाले दिनों में देश की जीडीपी में भरी गिरावट आएगी।

नोटबंदी ने राजनीती में भी उथल -पुथल भी उत्पन्न कर दी है, विपक्ष एक जुट हो गया है, कहीं धरने तो कहीं बयानबाजी का दौर भी शुरू हो गया है, अब इस विरोध का मतलब जनता और देश की भलाई है या फिर आने वाले चुनावों में इस्तेमाल होने वाले अपने पैसे का डूबना, राजनीती में भ्रष्टाचार और कालेधन का नाता बहुत पुराना है। इसका एक पहलु यह भी हो सकता है की कहीं यह नोटबंदी का फैसला ही किसी राजनितिक साजिश का हिस्सा ना हो यह ऐसा इसलिए है क्योंकि जहां देश में इन्टरनेट साक्षरता बहुत कम हो वहां कैशलेस इकॉनमी कैसे संभव हैं।

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हमारे देश में भले ही 4 या 5 जी तकनीक को अपना रहा हो मगर सच यह भी है की अभी बहुत लोग इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं करते और इन्टरनेट के इस्तेमाल को लेके अभी भी लोगों की इसकी सुरक्षा के बारे में पता नहीं है, लोगों के हाथ में पैसा नहीं है वह कार्ड का इस्तेमाल करेंगे, और देश के मैदानी इलाके में  रहने वाले लोग ,खेती-बाड़ी से जुड़े लोग कैसे काम करेंगे।   हर 3 में 2 सेकंड में एक इन्टरनेट फ्रॉड हो रहा है,  दूसरी बात हमारी इंटरनेट सुरक्षा प्रणाली भी इतनी मज़बूत नहीं कि इस फ्रॉड को रोका जाए। कुछ दिन पहले देश की  कई बड़ी-बड़ी हस्तियों के ट्विटर अकाउंट बड़ी आसानी के साथ हैक कर लिये जाते हैं। 8 नवम्बर से पहले तक देश के राजनैतिक गलियारे से लेके कारोबारी घरानों तक शायद किसी को अंदाज़ा नहीं था की साल के आखरी महीने में कुछ ऐसा भी होगा।

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देश का जायदातर मीडिया भी इस फैसले का समर्थन करता नज़र आ रहा है अब इसके पीछे कोई डर हो या कोई मज़बूरी,  केंद्र सरकार के इस फैसले का कोई भी पूरे तौर पे खुलके विरोध नहीं कर रहा है। 50 दिनों बाद इस फैसले से राजनीति को कितना फायदा होगा और कितना नुकसान और जनता को इससे क्या हासिल होगा, यह तो 50 दिन के बाद ही सामने आएगा। कालेधन वालों पे कार्यवाही तो हुई है मगर उनका क्या जो अपनी ही मेहनत की कमाई को तरस रहे हैं। वैसे भी हमारे देश में कहा जाता है कि बाप बड़ा ना भइया, सबसे बड़ा रुपइया,  फिलहाल शादी वाला घर हो या किसी के यहां कोई गुज़र गया हो या फिर कोई बीमार हो, बैंको की क़तारों में कोई भेद-भाव नहीं है, क्योंकि नोटबंदी का समय है और देश कतार में लगा हुआ है।

लेखक मनीष वर्मा के अपने निजी विचार…

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