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Amritsar accident

अमृतसर ट्रेन हादसा-हादसों पर राजनीति और कोसने का दौर

नयी दिल्ली। भारत में जब भी कोई हादसा होता है तो देश भर के मीडिया ग्रुप दिनभर उसी पर अपनी चोंच लड़ाते रहते हैं। उनका एक सूत्री काम होता है कि किसी तरह दर्शकों को असली मुद्दों से भटकाये रखना। किसी एक राजनीतिक दल की पैरवी करना और दूसरे दल की खिंचाई करना ही उनके मंसूबे रहते हैं। टीवी एंकर चीख चीख कर हादसे की जिममदारी किसी एक के माथे पर फोड़ते रहते हैं। जब ऐसे समय में तो मीडिया का काम होना चाहिये कि हादसाग्रस्त लोगों को आपने माध्यम से सरकारी राहत राशि दिलवाने में सही रिपोर्टिंग के जरिये सही आंकडे़ पहुचायें। लेकिन ऐसा होता नहीं है।

आज के समय मंे मीडिया हाउस किसी न किसी राजनीतिक दल की सरपरस्ती में चल रहे है। शुक्रवार को दशहरे के दिन रावण दहन के दौरान पंजाब के अमृतसर शहर में ऐसा दर्दनाक हादसा हुआ जिसमें भारी संख्या में लोग घायल हुए और 60 से ज्यादा लोगों की मौत हो गयी। जालंधर से आ रही एक डीएमयू ट्रेन ने रेलवे ट्रैक पर खडे़ सैकड़ों लोगों को कुचल दिया। इस हादसे पर राजनीतिक दलों ने सहानुभूति कम राजनीतिक रोटियां सेंकनी शुरू कर दी है। जले पर नमक छिड़कने का काम मीडिया करने में कल रात से ही लग गया है।

कुछ मीडिया समूह जो सत्ताधारी दल के पक्ष में वो प्रदेश सरकार पर ये कह कर निशाना साध रहे हें कि इतना बड़ा आयोजन किया जा रहा था तो प्रशासन को इसकी सूचना क्यों नहीं दी गयी थी। सवाल यह भी उठता है कि इतना सब कुछ पहले से चल रहा था। शहर में पोस्टर लगे हुए थे तो प्रशासन को इस बारे अपनी तरफ से पूछताछ नहीं करनी चाहिये थे। दूसरी ओर रेलवे ने साफ कर दिया कि इस हादसे में उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं है।

मीडिया चैनल चीख चीख कर कह रहे हैं कि घटना को दस घंटों से ज्यादा समय बीत गये हैं मुख्यमंत्री घटना स्थल पर नहीं पहुंचे हैं। इन समझदार पत्रकारों से ये पूछा जाये कि मुख्यमंत्री के पहुंचने से क्या सारी परेशानिया दूर हो जायेंगी। क्या मंत्री और नेताओं के पहुंचने से लोगों को राहत ज्यादा मिलेगी। सरकार का काम होता है कि हादसाग्रस्त लोगों को तुरंत राहत मिले उनका उपचार त्वरित और बेहतर हो। मृतको व घायलों के परिजनों को राहत राशि का भुगतान की व्यवस्था चुस्त दुरुस्त हो।

हमें इस बात पर भी ध्यान देना होगा कि हम अपनी जान जोखिम में क्यों डालते हैं। खासतौर से अमृतसर हादसे में तो उन लोगों की जिम्मेदारी बनती है कि उन्होंने अपनी जान जोखिम में क्यों डाली। रेलवे ट्रैक क्या वीडियो बनाने के लिये होता है। हर बार किसी हादसे के लिये सरकार या प्रशासन को कोसना ठाीक नहीं हमें भी अपनी जानमाल की चिंता होनी चाहिये।

विनय गोयल की रिपोर्ट

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