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जालिम को जो न रोके वो शामिल हैं जुल्म में…

पीएम मोदी ने कहा लोगों को तकलीफें तो होगी सह लो…. क्या ऐसी ही तकलीफों की बातें की गई थी ? देश के तमाम हिस्सों से खबरें आ रही हैं कि कही इलाज की वजह से किसी बच्चे की मौत हुई, तो कहीं औरतों के साथ मारपीट की गई, तो कहीं कोई बुजुर्ग की कतार में खड़े-खड़े ही मौत हो गई इत्यादि… आखिर यह कैसा फैसला है, जिससे यह कुछ दिनों की तकलीफें खत्म होने का नाम ही नही ले रही हैं। सरकार ने दूरगामी सोच के साथ फैसला तो ले लिया लेकिन यह दूरगामी फैसला कितने दिन का दूरगामी हैं, छह दिन, छह साल या फिर साठ साल आखिर कितना सोचिए जरा…

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सरकार को बेशक देश की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था को बनाए रखने के लिए ऐसे फैसले लेने चाहिए लेकिन फैसलों का मतलब केवल फैसले नहीं होते हैं। सरकार को इस फैसले को ग्राउंड लेवल पर उतारने के लिए योजनाएं बनानी चाहिए थी। ओह माफ करिएगा सत्ता में देश का सबसे बड़ा बुद्धीजीवी तबका विद्यमान हैं, उन्होंने अगर फैसला लिया है, तो सही ही होगा। ऐसे फैसलों में अगर देश की आवाम को तकलीफ हो, दुख हो, भूखा-प्यासा सोए तो इससे भला क्य़ा फर्क पड़ता हैं उन्हें… उन्हें केवल एक बयान ही तो देना होता हैं विपक्ष में बैठे लोगों के लिए, देश के आवाम के लिए… उनकी तकलीफें अगर दिख रही होती तो इस फैसले के तुरंत बाद आ रही दिक्कतों को हल करने के लिए कई अन्य और फैसले लिए जाते।

अभी भी वक्त हैं साहब, लगा दीजिए सरकारी स्कूलों के तमाम उन शिक्षकों को, जिनको आप चुनाव के वक्त इस्तेमाल करते हैं। लगा दीजिए साहब…! 8 नवम्बर को मोदी सरकार द्वारा लिए गए फैसले के बाद कल 13 नवम्बर को मोदी जी ने बयान दिया कि जो गरीब हैं इमानदार हैं वो मेरे फैसले के बाद सुख एवं शान्ति के साथ सो रहे हैं और जो बेइमान लोग हैं वो नींद की गोलियां ढ़ूढ़ रहे हैं लेकिन क्या इन बातों में सच्चाई नजर आ रही हैं। एक बार उन लोगों की तरफ देखें जो सुबह से कतार में खड़े हैं इस विड़म्बनाओं के साथ उन्हें पैसे मिल जाएगें तो उनके बच्चे का इलाज हो जाएगा। कोई लगा हैं कि उनके परिवार वालों को भोजन मिल सकेंगा लेकिन कतार में खड़े-खड़े ही पता चलता हैं कि पैसे ही समाप्त हों गए।

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हां लेकिन उन बेइमानों के घर से पैसा जरूर निकाल लिया, नोटबंदी के इस फैसले ने जो ब-मुश्किल 100-200 रुपए कमा लेते हैं और कुछ पैसे बचाकर घर के किसी कोने में छुपाकर रखते हैं और आज सरकार के इस फैसले से इतना घबरा गए हैं कि घंटों कतार में खड़े रहते हैं और पैसे बदल न पाने का दुख और जमा न हो पाने का दुख झेल रहे हैं। हमारे देश का एक बड़ा तबका ऐसा हैं जिनको एक वक्त का खाना सही ढ़ग से नसीब नहीं होता हैं, ऐसे में हमने उनको कुछ दिनों के लिए और भूखाकर दिया।

मैं पीएम मोदी का समर्थक हूं लेकिन कदापि इसका मतलब यह नहीं हुआ कि मैं जबरा वाला फैन बन जांउ और हर एक बात का समर्थन करूं। सरकार को इस फैसले को अचानक ही लागू करना चाहिए था, जो उन्होंने सही किया लेकिन इससे उभरने की प्रक्रिया के बारे में भी सोचना चाहिए था। ऐसे में मेरे जेहन में गौहर रजा की लिखी कुछ पंक्तिया याद आ रही हैं कि, जालिम को जो न रोके वो शामिल हैं जुल्म में, कातिल को जो न टोके वो कातिल के साथ हैं।

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नोटबंदी के फैसले के साथ सरकार ने कहा कि जिसके पास से काला धन मिला तो उसे टैक्स के साथ 200 फीसद का जुर्माना देना पड़ेगा। जबकि इकोनॉमिक्स टाइम्स ने आयकर विभाग के एक अधिकारी से बातचीत कर लिखा कि इस जुर्माने को लेकर आयकर अधिकारी दुविधा में हैं और कहते हैं कि कानून में ऐसा कोई भी प्रावधान नहीं हैं कि बैंक में राशि जमा करने पर 200 फीसद का जुर्माना देना पड़े, ऐसे में या तो सरकार को नोटबंदी के तारीख से नया कानून बनाना चाहिए या फिर इस जुर्माने को समाप्त कर देना चाहिए।

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आगरा के एक अखबार ने एक खबर छापी की जन-धन के खातों में पैसे जमा हो रहे हैं तो क्या ऐसे में सरकार बताएगी की, कितना पैसा जन-धन योजना में जमा किया गया हैं साथ ही कई जगह पर यह भी सुनने को मिला हैं कि बैंकों के बाहर किस तरह से लोग कालेधन को एडजस्ट करने का जुगाड़ कर रहे हैं तो क्या ऐसे हालातो को रोकने के लिए सरकार के पास कोई एक्शन प्लान हैं?

चलिए इन बातों को यही समाप्त करिए ये बताइए कि, क्या देश के हालात सुधर पाएगे कुछ दिनों में या फिर महगांई वापस आएगी। जिस तरह से पैसों को ब्लॉक कर दिया गया हैं और नई करेंसी को बाजार में आने में वक्त लग रहा हैं, तो साधारण सी बात नजर आ रही हैं कि, महगांई का स्तर बढ़ता चला जाएगा। खैर सरकार से बस इतनी ही उम्मीद करता हूं कि जल्द-से-जल्द कोई एक्शन प्लान दिखाए ताकि इन दुविधाओं से निजात पाया जा सके।

लेखक अनुराग गुप्ता के अपने निजी विचार…

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