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शैलेंद्र का अलग था अंदाज !

नईदिल्ली: अपने अलग अंदाज और बेबाकी के लिए मसहूर गीतकार शंकरदास केसारीलाल शैलेंद्र ने अपने गीतों पर लोगों को मोहित कर लिया। मेरा जूता है जापानी, किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार, दोस्त दोस्त ना रहा ऐसे अन्य गीतों ने लोगो को काफी लुभाया हैं और दिल के तार जोड़े हैं।

रोजमर्रा की जिन्दगीं से लोगों के दर्द को निकाल कर गीतों के जरिए परोसा हैं। जिसके बाद गीतों के माध्यम सें लोगों नें दर्द को बखूबी समझा हैं। बता दे कि शैलेंद्र का जन्म 30 अगस्त 1923 को रावलपिंडी में हुआ था। गीतकार शैलेंद्र का गांव बिहार के भोजपुर मे हैं। गीतकार शैलेंद्र के पिता फौजी थे और उनकी पोस्ट रावलपिंडी में थी। जिसकी वजह से गीतकार शैलेंद्र का पूरा परिवार रावलपिंडी में रहता था।

गीतकार शैलेंद्र की रुचि बचपन से ही साहित्य के प्रति थी। लेकिन घर के हालातो की वजह से उन्हें साहित्य को दरकिनार कर रेलवे की नौकरी करनी पड़ी। नौकरी के दौरान वो अक्सर पेड़ के नीचे बैठ कर गीत और कविताएँ लिखते थे। जिसकी वजह से उनके साथी उन्हें कामपर ध्यान देनें के लिए कहते थे साथ ही कहते थे कि काम करो उससे ही घर चलेगा ना कि कविता से।

कविताओं के लिए बढ़ता प्यार देख कर उन्होंने गीत लिखना शुरू कर दिया। 1947 में जब देश आजाद हुआ तभी गायक शैलेंद्र ने गीत लिखा था, ‘जलता हैं पंजाब साथियो…’ इस गीत को जननाट्य संघ में शैलेंद्र को गुनगुना पड़ा। उसी दौरान श्रोताओं में राज कपूर भी थे।

उन दिनों राजकपूर अपनी पहली फिल्म आग बनाने में मसगूल थे। तभी राजकपूर नें गायक शैलेंद्र की प्रतिभा को पहचान लिया था। उसी दौरान राजकपूर नें उनसे उनका गीत जलता पंजाब मागा तो शैलेंद्र ने कहा कि वो पैसो के लिए नहीं लिखते हैं।

गीतकार शैलेंद्र की गृहस्थी जब बनने लगी तो वो आर्थिक तंगी महसूस करने लगे थे। तब वो राजकपूर के पास गए। उन दिनों वो बरसात मूवी की सूटिंग में बिजी थे। तभी उन्होंने शैलेंद्र को दो गाने लिखने के लिए कहा। इन दिनों मिले साथ के बाद 16-17 साल तक इनका साथ चला। बरसात फिल्म से मिली शुरूआत के बाद से मेरा नाम जोकर तक राजकपूर साहब की सारी फिल्मों के गाने शैलेंद्र ने ही लिखे थे।

43 वर्ष की उर्म तक उन्होंने लोगो को अपने गानों के जरिए मंत्र-मुग्ध कर रखा था। ज्यादा शराब पीने के चलते लीवर सिसोरिस बीमारी की वजह से उनका निधन हो गया। बता दे कि 14 दिसंबर 1966 को गायक शैलेंद्र का निधन हो गया। उसी दिन राजकपूर साहब का जन्मदिन था।

राजकपूर जी ने उन दिनों कहा था कि, “मेरे दोस्त ने जाने के लिए कौन सा दिन चुना, किसी का जन्म, किसी का मरण। कवि था ना, इस बात को खूब समझता था।”

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