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महाराणा प्रताप की वह सौगंध जैसे आज भी उनकी पीढ़ियां निभा रही है

आज मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप की 424 वी पुण्यतिथि है. वैसे तो आपने किस्से,कहानियों और किताबों में महाराणा प्रताप की वीरता के कई किस्से सुने होंगे. चाहे वो हल्दीघाटी के समय अपनी छोटी सी सेना के साथ वह मुगल राजा जलालुद्दीन अकबर के साथ भिड़ना हों, या फिर अपने सुवाभिमान की खातिर जंगलों में रहने के किस्से भारत में हर बच्चे-बच्चे की जुबान पर रटे हुए है.

आज हम उस किस्से की बात कर रहे है जिसे आज भी महाराणा प्रताप की पीढ़ियां निभा रही है.

वर्ष 1567 में जब महाराणा प्रताप के पिता उदय सिंह द्वितीय मेवाड़ के राजा थे. तब मेवाड़ ने अकबर की उसकी छाया में रहकर राज्य करने की संधि को नकार दिया. जिसके बाद अकबर ने उस समय की मेवाड़ की राजधानी चित्तौड़ पर हमला बोल दिया. अकबर के अचानक हमला बोलने से महाराणा प्रताप और उदय सिंह को अपनी राजधानी चित्तौड़ छोड़कर उदयपुर जाना पड़ा. और इस युद्ध के बाद महाराणा प्रताप में शपथ ली जब तक वह चित्तौड़ को दोबारा वापस नहीं ले लेते वह घास के बने बिस्तर पर ही सोएंगे. और यह शपथ माहाराणा प्रताप ने अपने पुत्र अमर सिंह को भी दिलाई. जिसके बाद पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती गई. आज भी महाराणा प्रताप के वंशज अपने तकिए के नीचे घास का टुकड़ा लेकर ही सोते है.

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