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सोशल मीडिया  में कहीं खो सी गई हूं, परिवार से दूर हो गईं हूं

आज जब मैं अपने ऑफिस में बैठी थी तो सोचा क्यों न कुछ सोशल मीडिया के दिनों-दिन बढते प्रचलन के बारे में लिखूं व भी क्या दिन होते थे जब हम रात में अपनी दादी माँ के पास बैठ कर उन से कहानियों को सुनने कि जिद्द किया करते थे, पर ना जाने मन के अंदर से कहानियों को सुनने की इच्छायें खत्म सी हो गई, और मेरी इच्छाओं ने जगह ले ली Facebook, whatsapp, जैसे ऐप्स् पर chatting करने में। अब रात में ऐसा मानों कि बिना whatsapp पर chatting किए बिना नींद ही नहीं आती। कल ही माँ ने कहा कि तेरे पास क्या बैठूं पूरे दिन तो ऑफिस में रहती है और जब घर आती है तो Phone पर लग जाती है, तेरे पास तो मेरे लिए समय ही नहीं हैं, फिर मैं माँ के उस बात पर सोचने को मजबूर हो गई कि मैंने तो Facebook, whatsapp पर अपना अकाउंट इसलिए बनाया था कि अपना अकेलापन जो अपने MJMC  की पढाई के दौरान हॉस्टल मैं किया करती थी, उसे दूर कर सकूं पर इसने तो मुझे मेरी मां से ही दूर कर दिया और शायद अकेले रहते-रहते मैं whatsapp Facebook, में खो सी गई। कहीं मैं अकेली तो नहीं हो गई ?

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पहले एक समय था कि बच्चे गंदी आदतों के चलते बाहर कि चीजों को ज्यादा खाना, पर समय के साथ-साथ बच्चों की आदतें भी बदलती जा रही हैं और ये आदतें है अपने मम्मी, पापा, बुआ के Mobile  में वीडियो देखना या  गेम खेलना। अब बच्चे भी ABCD किताबों में नहीं बल्कि लैपटॉप या मोबाईल देखना पसंद करते हैं। हंसी आती जब किसी छोटी सी बच्ची को अपनी बुआ के मोबाईल को छुपा कर एक कोने में you-tube पर वीडियो सुनते हुए देखती हूं।  अमेरिका की एक यूनिवर्सिटी के रिपोर्ट कि मानें तो मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, लेकिन आज की ये आधुनिक जिंदगी हमें हमारे परिवार से दूर ले जा रही है।

शोध की मानें तो 19 से 32 साल के 1,500 युवाओं के द्वारा 11 सबसे लोकप्रिय सोशल साइट्स इस्तेमाल करने के संबंध में उनसे मिली विचारों का सर्वेक्षण किया गया और यह पाया गया कि सोशल मीडिया पर दो घंटे से ज्यादा समय बिताने वाले और आधे घंटे से भी कम बिताने वाले लोगों के बीच सामाजिक तौर पर अकेला महसूस करने के विचारों में अंतर पाया गया।

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शोधकर्ताओं की मानें तो जो लोग प्रति हफ्ते 58 बार या उससे से ज्यादा समय सोशल साइट्स पर बिताते हैं, उन्होंने प्रति हफ्ते 9 घंटे से कम वक्त बिताने वालों की अपेक्षा खुद को ज्यादा समय तक समाज से अलग-थलग पाया। शोध के अनुसार, जितना समय कोई इंसान ऑनलाइन रहता है व उतना ही सामाज और अपने लोगों से दूर रहता है। इन सब बातों के बाद में सोचने को मजबूर हो गई की इंटरनेट ने हमारी जिंदगी आसान  है या मुश्किलों से भर दिया है। शायद अब इंटरनेट आने के कारण जिंदगी से वह मासूमियत खो सी गई है। हम आगे तो बढ़ गए पर अपने शायद कहीं पीछे छूट गए हैं।

अनिता झा के विचार

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