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महानवमी पर विशेष- दो दिन की देवी माता

नयी दिल्ली। भारत में महिला को देवी का दर्जा दिया जाता है। गन्थों में भी कहा गया है भारत ऐसा देश है जहां नारियों की पूजा की जाती है अर्थात यत्र नार्यस्तु पूजयंते। ये बात प्राचीन काल से हमें और आपको बतायी जा रही है। हम लोग इसी को सच मान कर चले आ रहे हैं। लेकिन जैसे जैसे समय बीतता जा रहा है। देश में महिला पूजने की जगह भोगने की वस्तु बन गयी है। ऐसा मैं नहीं कह रहा बल्कि समाज में हो रही महिलाओं और युवतियों के प्रति हो रहे अनाचार और अत्याचार इसकी बानगी हैं। मैं इस मामले में और गहरायी से नहीं जाना चाह रहा हं। आज मैं उन मासूम बच्चियों के बारे में कहना चाह रहा हूं जो हमारे घरों के आस पास और झुग्गियों में बसती हैं। नवरात्र में सिर्फ एक दो दिनों के लिये ये बच्चियां मां का अवतार मानी जाती हैं। लोग इनके पैर पूज कर भोजन कराते हैं। बरकी दिनों में इन्ही बच्चियों से लोग अपने घरों में झाड़ू बर्तन मंजवाते हैं। ये कैसी आस्था और श्रद्धा है जो कुछ दिनों के लिये होती है। इस तरह की परंपरा को लोग महज इस लिये ढो रहे हैं कि उनके पूर्वज करते चले आ रहे हैं।

आज महानवमी है। हर हिन्दू परिवार में इसकी पूजा अर्चना की जा रही है। ऐसे में कन्यापूजन भी एक प्रथा है जो काफी समय से चली आ रही है। इस पूजन में आठ कन्याओं के पैर पूज कर उन्हें भोजन कराया जाता है। पाॅश कालोनी और सोसाइटीज में रहने वालों की अधिकांश  बच्चियां कन्या पूजन में हिस्सेदार नहीं होती है। शायद इस लिये कि उनकी शान में बट्टा लगेगा कि कपूर साब की बेटी किसी शर्मा जी के घर कन्या पूजन में जाये। महानगरों में लोगों की पहचान उनके प्रोफेशन से नहीं बल्कि उनकी शान शौकत और गाड़ियों से आंकी जाती है।

ऐसे में सवाल यह उठता है कि आठ कन्याओं की व्यवस्था कैसे की जाये। ऐसे में इन लोगों के घरो में चैका बर्तन करने वाली बाइयां इनकी इस समस्या का समाधान करती हैं। उनसे दो दिन पहले कह दिया जाता हे कि आठ दस बच्चियां उसे लानी हैं। बाइयां इस जिममेदारी को बखूबी निभाती हैं। वो अपने घर के आस पास रहने वाली आठ दस साल की बच्चियों को बटोर कर इन हाई सोसाइटी और कालोनियों में ला कर लोगों को कन्या पूजन को सौंप देती हैं। इन घरों में बच्चों को भरपेट भोजन और चंद रुपये व उनकी पसंद की वस्तुएं गिफ्ट की जाती हैं। मासूम बच्चियां रुपये व गिफ्ट पाकर खुशी से झूमते हुए इस घर से उस घर सुबह से दोपहर तक इस परंपरा का हिस्सा बनती रहती हैं। समझ में नहीं आता है अष्टमी ओर नवमी के बाद ये बच्चियां देवी क्यों नहीं मानी जाती हैं।

विनय गोयल की रिपोर्ट

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