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सुप्रीमकोर्ट की आंख में धूल झोंकने की तैयारी

हाल ही में सुप्रीमकोर्ट ने राष्ट्रीय राज मार्ग पर होने वाली शराब की बिक्री पर रोक लगाने का ऐतिहासिक आदेश दिया है। उच्चतम न्यायालय के इस आदेश से शराब उद्योग से जुड़ें लोगों में हड़कंप मच गया है। अदालत के आदेश के अनुसार नेशनल हाइवे से 500 मीटर के दायरे में शराब की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। शराब व्यवसायियों के साथ होटल और रेस्टोरेंट से जुड़े लोग भी अदालत के इस फैसले से प्रभावित हो रहे है जिनके प्रतिष्ठान नेशनल हाइवे पर हैं और शराब की खुलेआम बिक्री करते हैं। यह देखने में आ रहा है कि प्रदेश सरकारें अदालत के आदेश से बचने के लिये तिकड़में लगाने में जुट गयी है।

एक तरफ तो केन्द्र सरकार का परिवहन मंत्रालय नेशनल हाईवे बनवाने की मुहिम चलाये हुए है। मंत्रालय ने प्रदेश सरकारों की मांग पर अनेक प्रदेशों की हजारो किमी. सड़कों को हाईवे में प्रमोट कर दिया है। ऐसा करने से सड़कों को उच्च दर्जे के साथ कुछ अतिरिक्त सुविधाएं भी मिल जाती है। वहां एंबुलेंस, लाइटिंग और पेट्रोलिंग जैसी सुविधाएं मुहैया करायी जाती हैं। वहीं कुछ सरकारें शराब की बिक्री को जारी रखने के लिये जुगाड़ करने में जुट गयी हैं। शराब की बिक्री कराने के लिये बाईपास और नेशनल हाईवे का नाम बदला जाने लगा है। इससे सड़कों को डिमोट किया जा रहा है। नेशनल हाईवे से शहरी मार्ग में तब्दील किया जा रहा है। हालांकि इससे पहले सड़कों की दशा सुधारने की लिये प्रदेश सरकारों ने केन्द्र सरकार से मांग की थी।

पांच राज्यों में आम चुनाव से पहले परिवहन मंत्रालय ने अनुसार 2016-17 के बीच 21,121 किमी. लंबी राज्य मार्गों को नेशनल हाई वे बदला गया है। इनमें 25 राज्यों की 57 हजार किमी लंबी सड़कें शामिल हैं जिनको नेशनल हाईवे में तब्दील करने की स्वीकृति दी जा चुकी है।
वह अपने प्रदेश के हाइवे को डिनोटीफाई कर चोर दरवाजे से शहरी मार्ग घोषित कराने के प्रयास में जुट गयी हैं। इसमें महाराष्ट्र की सरकार कुछ ज्यादा ही तेजी दिखा रही है। महाराष्ट्र में 8002 किमी लंबी सड़कों का 2016-17 में नेशनल हाईवे का दजा दिया गया है। अब वहां की सरकार नेशनल हाईवे का डिनोटीफाई कर उनका नाम बदल कर शहरी मार्ग कर रही है। ऐसा कर प्रदेश सरकार शराब व्यवसाय को बचाने का प्रयास कर रही है।

ऐसा ही कुछ प्रयास बीजेपी शासित प्रदेश यूपी, राजस्थान, हरियाणा व छत्तीसगढ की सरकारें करने के प्रयास में जुट गयी हैं। सुप्रीम कोर्ट के वकील पद्मश्री ब्रह्मदत्त का कहना है कि आदेश के से बचने का प्रयास करना व जुगाड़ लगाना गैर कानूनी है। अदालत के आदेश न मानना भी गलत है। फैसले के खिलाफ तरकीबें सोचना भी अपराध माना जायेगा।

विनय गोयल के विचार

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