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Tag Archives: think writer think

इंतज़ार…

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सुबह भेजने की जल्दी शाम को इंतज़ार करती है, घर आने की खुशी देरी का तकरार करती है, दिल में खुशी चेहरे पे गुस्सा आंखों से इकरार करती है, इश्क में इंसानियत की दिल से दीदार करती है, प्यार को लब्ज़ों से नहीं आंखों से बयां करती है, हुई देरी …

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वो पराई हो गई…

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सपनों की वो गुड़िया जो संग में खेला करती थी वो पराई हो गई, कल तक थी वो लाड़ली बात बात में झमेला करती थी वो पराई हो गई, एक पेड़ की थी वो टहनी हर पल को संजोया करती थी वो पराई हो गई, परंपराओं की थी वो विडंबना …

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बेसहारा हो गया…

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बेसहारा हरे भरे बाग का बागवां बेसहारा हो गया, उम्मीदों में लगा पेड़ अब बड़ा हो गया, छांव के लिये तरसता बागवां बेसहारा हो गया, खून पसीने से सींचा पेड़ अब वो खड़ा हो गया, फल खाने के समय बागवां बेसहारा हो गया, चार दीवारियों से घिरा पेड़ अब हरा …

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जागों लाइनों में खड़े हो जाओ

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कवि की कविता जो लोगों को एहसास कराती हैं जिन्दगी से जुड़े फलसफों के बारे में… बचो देश के गद्दारों से, “भारत माता” का नारा लगाएगा नासमझी थी, समझाकर, देशवासियों को लूट जाएगा जागों लाइनों में खड़े हो जाओ, देश का काला धन खत्म हो जाएगा। तुम्हारे कंधों पे बंदूक …

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आम से खास बनता सोच का दायरा…

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हमारा संविधान जिसे हम हमारा कह रहे हैं, क्या वो हमारा हैं? दरअसल आज के वक्त में हमारा रहा ही नहीं हैं। मुझे 2014 के पहले का दौर याद आ रहा हैं, जहां पर सरकार की आलोचना करने पर हमले नहीं हुआ करते थे। वो दौर था जहां लोग खुलकर …

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संदेश कविता की पहल में…

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कवि की कविता जैसे किसी का पहला प्यार, दिल से जुड़े जज्ब़ात या फिर वो बात जो दिल की तह में बस गई हो। कविता वो एहसास हैं, जो मन में चल रही विडम्बनाओं को शब्दों के जरिए परोसा जाता हैं। किसी कवि की पहली कविता वे शुरूआती अक्षर होते …

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मुल्क की दुर्भाग्यवश आवाम, जो हो रही हैं कुर्बान…

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500-1000 के नोटबंदी की गूंज आपको संसद से लेकर सड़क तक हर जगह सुनने को मिलेगी। 8 नवम्बर की मध्य-रात्रि प्रधानमंत्री का देश के नाम संबोधन पश्चात 500-1000 के पुराने नोट रद्दी हो गए। जिन्होंने भी वरसो-वरस से भ्रष्टाचार करके लाखों-करोड़ो रुपए बचा के रखे थे, अब महज वो कागज …

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जालिम को जो न रोके वो शामिल हैं जुल्म में…

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पीएम मोदी ने कहा लोगों को तकलीफें तो होगी सह लो…. क्या ऐसी ही तकलीफों की बातें की गई थी ? देश के तमाम हिस्सों से खबरें आ रही हैं कि कही इलाज की वजह से किसी बच्चे की मौत हुई, तो कहीं औरतों के साथ मारपीट की गई, तो …

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आखिर देश पर क्यों लग रहा है सवालिया निशान?

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आखिर क्यों उठाना पड़ा रवीश कुमार को यह कदम कि सहारा मूक अभिनय के सिवा कुछ और न मिला। इसका जवाब कौन देगा, खुद रवीश कुमार, एनडीटीवी या फिर हमारी शासन व्यवस्था, आखिर कौन? यह बहुत मार्मिक सवाल हैं लेकिन इसके बारे में सोचना तो पड़ेगा, कि आखिरकार क्यों किसी …

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अंग्रेजी स्कूलों से गुजरता हुआ सरकारी भविष्य?

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आज स्थिति ये हो गई है कि सरकारी नौकरी की चाहत रखने वाला या सरकारी नौकरी में सेवारत व्यक्ति अपने बच्चों को निजी इंग्लिश मीडियम स्कूलों में पढ़ाता है। आर्थिक रूप से संपन्न सरकारी सेवारत स्थाई शिक्षकों के बच्चे तो निश्चित तौर निजी स्कूलों में ही पढ़ते है।  दूसरी सरकारी …

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