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दस रुपये का सिक्का

शुक्रवार की रात से मैं काफी परेशान था। आफिस से जब मैं घर पहुंचा तो देखा कि आॅटो वाले ने जो दस रुपये का सिक्का दिया वो नकली था। यह बात मुझे घर जा कर ही पता चली। बात इतनी बड़ी भी नहीं थी कि ज्यादा सोचा जाये। लेकिन यह बात दिमाग से नहीं निकल नहीं रही थी। अगले दिन शनिवार को मेरा आॅफ था। इसलिये आॅफिस जाना नहीं था। सब कामों से फारिग हो कर यह सोचा चलो आज पत्नी को कहीं घुमा दिया जाये। वैसे मेरे लिये पत्नी के साथ कहीं घूमने जाना इतना आसान नहीं था। इसलिये अक्सर हम दोनों ही एकदूसरे के साथ जाने में कतराया करते थे। घूमने जाने के हिसाब से हमारे अनुभव अच्छे नहीं थे। अक्सर रास्ते में दोनों का किसी न किसी बात पर झगड़ा हो ही जाता था। आज जब मैंने पत्नी से कहीं चलने की बात कही तो उसने हैरत से मेरी ओर देखते हुए बिना बोले ही पूछ लिया कि आज सूरज पश्चिम से निकला है। मैंने उसे बताया कि काफी दिनो से हम कहीं घूमने नहीं इस लिये सोचा कि आज चलते हैं। बच्चों को पता चला तो बहुत खुश हुए कि मम्मी-पापा आज साथ कहीं घूमने जाने को तैयार हुए हैं।

घर से निकलते निकलते लगभग 11 बज चुके थे। हम दोनो नजदीक के बस स्टैंड पर बैठ कर बस का इंतजार करने लगे। अभी तक यह तय नहीं हुआ था कि चलना कहां है। अभी तक मैंने पत्नी को रात वाली बात से वाकिफ नहीं किया था। बस का इंतजार करते हुए मैंने बताया कि रात में आॅटो वाले ने मुझे दस रुपये का नकली सिक्का थमा दिया है।

उसने तुरंत रियेक्ट किया कि क्या लेते समय ध्यान नहीं दिया था। मैंने कहा- रात में जहां आॅटो रुका वहां काफी अंधेरा था। इसलिये सिक्का जांच नहीं पाया। कुछ दूर चलने पर रोशनी में देखा कि सिक्का तो नकली है। अब किया भी क्या जा सकता था। आॅटो तो जा चुका था। अफसोस करने के आलावा को चारा नहीं था। इतना बड़ा नुकसान तो नहीं था जिस पर ज्यादा सिर खपाया जाये लेकिन यह बात दिलो दिमाग पर छा गयी थी। यही सोच रहा था कि इस नकली सिक्के को कहां खपाया जाये। इसी उहापोह में रात निकल गयी।

पत्नी ने भी कोई प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त की। पंद्रह मिनट तक जब बस नहीं आयी तो दिमाग में आया कि चलो ग्रामीण सेवा से चलते हैं। मौका मिला तो यह सिक्का भी चला दिया जायेगा। लेकिन हमारी मंशा के अनुरूप नहीं हुआ बस आ गयी और हम दोनों बस में सवार हो कर कनाॅट प्लेस के लिये रवाना हो गये। पत्नी ने टिकट लेने के लिये वहीं खोटा सिक्का दिया लेकिन कंडक्टर ने खोटा बता कर वापस कर दिया। सिक्का चलाने का पहला प्रयास विफल हो गया। आई टी ओ स्टैंड पर उतर कर आगे जाने वाली बस का इंतजार करना था। कुछ देर बाद बाद सीपी की बस आ गयी और हम दोनों ही बस में बैठ गये। लगभग 10 मिनट के बाद हम सीपी के निकट पहुंच गये। रास्ते भर मैं पतनी को खास जगहों और होटलों के बारे में भी बताता जा रहा था।

इतने में हम जनपथ मार्केट पहुंच गये। वहां का मार्केट देख पत्नी को अच्छा लगा। क्योंकि सारी महिलाओं को बाजार में घूमना अच्छा लगता है। खरीदना ना भी हो लेकिन मोलभाव जरूर करती हैं। लेकिन पत्नी केवल दूर से देख कर ही काम चला लेती है। आधा घंटा वहां बिताने के बाद हम लोग सीपी के आसपास घूमने लगे। एक जगह एक छोटा सा रेस्टोरेंट देख मैंने पत्नी से पूछा चाय पी जाये। उसने सकुचाते हुए कहा बहुत महंगी होगी। मैंने कहा उसकी तुम फिक्र मत करो। काउन्टर पर जा कर मैंने दो काॅफी का आर्डर कर दिया। वहां सर्व करने के लिये कोई नहीं थी अतः सेल्फ सर्विस ही थी। मैंने सोचा कि कुछ स्नैक्स भी आर्डर कर दिया जाये। लेकिन दाम सुन कर मेरी हिम्मत जवाब दे गयी। फिर भी मैंने दो पेटीस ले ही लीं। पत्नी को बताया तो उसने कहा पेटीस की क्या जरूरत है। घर से नाश्ता तो करके आये हैं।

मैंने कहा कोई बात नहीं, जब यहां आये हैं तो कुछ तो खा पी लिया जाये। पैसों को ले कर पत्नी काफी सेंसटिव रहती है। हम दोनो पास ही सीढ़ियों पर बैठ कर काॅफी की चुस्कियां लेने लगे। अभी हम काॅफी पी रहे थे कि चार पांच दिल्ली पुलिस के जवान वहां आ गये और एक जोड़े के पास खड़े हो गये। यह देख पत्नी ने कहा लगता यहां बैठ कर चाय काॅफी पीना मना है। मैंने कहा ऐसी बात नहीं और भी लोग तो हैं जो बैठ कर चाय काॅफी पी रहे हैं। वैसे तो मुझे अपनी बात पर यकीन था लेकिन पुलिस वालों की बात पर भरोसा नहीं था किसी को किसी भी मामले फंसा देते हैं। कुछ देर वो लोग उस जोड़े के पास खड़े रहे और किसी बात को लेकर जुर्माना कर दिया। उनके जाने के बाद पता चला किया युवक सार्वजनिक स्थल पर सिगरेट पी रहा था। यह जानकर पत्नी ने राहत की सांस ली। कुछ देर हम लोग वहां रहे बैठ कर काॅफी पीते रहे।

इसके बाद हम लोग पालिका बाजार में बेवजह ही घूमने लगे। मुझे मालूम था कि पत्नी यहां से कोई शापिंग नहीं करेगी। फिर भी दुकानों में लगे परिधानों को देखना और उन पर टिप्पणी करना महिलाओं की आदत होती है। लेकिन यहां घूमते हुए भ मेरे दिमाग में वो नकली दस रुपये का सिक्का घूम रहा था। दिन के उजाले में उस सिक्के को चलाना हमारे लिये आसान नहीं था। अब यहीं सोच रहा था कि अगले दिन आॅफिस आते जाते समय ही इसको चलाया जा सकता है। हम लोग दो तीन घंटे घूमने के बाद पूरी तरह थक चुके थे। घर लौटने की मंशा बना चुके थे। दो तीन जगह बसें बदल कर आखिरकार हम घर पहुंच ही गये। घर पहंुचते ही बेटे ने पूछा रास्ते में झगड़ा तो नहीं हुआ। मैंने कोई जवाब न देते हुए सिर्फ मुस्करा दिया।

अगले दिन हमेशा की तरह मैं आफिस जाने के लिये आठ बजे तक घर से निकल चुका था। आते समय मैं आॅटो वाले को सिक्का नहीं देना चाहता था क्यों कि दिन के समय आॅटो वाले सिक्कों को आसानी से पहचान लेते हैं। इस लिये बेवजह की झायं-झायं से मैं बचना चाहता था। टाइम से आॅफिस भी पहुंचना होता है। लेकिन आॅफिस से लौटते समय भी मैं किसी और रूट से घर पहुंचा था। आॅटो करने की जरूरत नहीं पड़ी। दूसरा कारण था कि मैं लगभग पांच बजे तक घर पहुंच गया था। इस लिये दस का सिक्का चलाने में सफल नहीं हो सका।

सोमवार को आॅफिस आ कर मैं अपने काम में व्यस्त हो गया। लेकिन आॅफिस आने के बीच में मैंने एक आध जगह उस सिक्के को चलाने का असफल प्रयास किया। यहां तक कि मैंने उसे एक भिखारी को दिया तो उसने भी लेने से मना कर दिया। ऐसे में मुझे लगा कि अब यह सिक्का मुझे रास्ते में ही फेंकना होगा। मैं उस टैंपो चालक को मन ही मन कोसने लगा जिसने मुझे खोटा सिक्का थमाया था। मैं पूरी तरह निराश हो चुका था। आॅफिस से निकल कर रोज की तरह मैं आनंद विहार जाने वाली बस मे बैठ कर घर आने की तैयारी कर रहा था।

अचानक मैं नोयडा मोड़ पर उतर कर लक्ष्मी नगर जाने वाली बस में बैठ गया। वहां से प्रीत विहार वाले स्टैंड पर उतर कर विवेक विहार वाले आॅटो का इंतजार करने लगा। कुछ देर में ही आॅटो में बैठ भी गया। आॅटो पूरी तरह से नहीं भरा था लेकिन कम सवारी होने के बाद भी वहां से आगे बढ़ गया। अब मुझे इस बात की चिंता सताने लगी कि ज्यादा सवारी न होने पर ज्यादा लोग नहीं होंगे तो चालक गौर से देख कर पैसे लेगा। हाथ में मैंने सिक्का निकाल कर रख लिया। ज्यौं ज्यौं मेरा घर नजदीक आता जा रहा था, मेरी बेचैनी बढती जा रही थी। इस बीच काफी सवारियां आॅटो से उतर चुकी थीं। लेकिन कुछ नयी सवारियां भी बैठ चुकी थीं।
मैं यह सोच रहा था कि ड्राइवर सिक्का देख कर कैसे रियेक्ट करेगा। सबके सामने ही कहेगा-अरे! यह तो नकली है। मैं ही मिला था यह नकली सिक्का चलाने के लिये। साथ के लोग भी कैसी निगाहों से देखेंगे। सब मुस्करा कर कहेंगे तो कुछ नहीं लेकिन उनकी व्यंग्य भरी मुस्कराट मुझे अंदर तक छेद जायेगी। उनकी निगाहों का मैं कैसे सामना कर पाऊंगा। इसी बीच मैरा सटैंड आ गया मैं हड़बडा कर आॅटो से उतरा और जल्दी से सिक्का चालक के हाथ में रख दिया। ड्राइवर ने सिक्का लिया और अपने गल्ले में डाल दिया और आॅटो आगे बढ़ा दिया। मैंने राहत की सांस ली। ऐसा कुछ भी नहीं हुआ जिसकी मैं कल्पना कर रहा था। लेकिन मन ही मन सोच रहा था कि आखिरकार मैंने खोटे सिक्के को चला दिया। एक तरफ खोटा चलाने की खुशी तो दूसरी ओर अनजान व्यक्ति के ठगे जाने का ख्याल मुझे धिक्कार रहा था।

विनय गोयल के विचार

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