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…..चेहरा खुद ब खुद खिल उठता है जब घर जाता हूं

कोई ख्वाहिश अधूरी सी लगती है जब घर जाता हूं,

एक तड़प फिर से उभर जाती है जब घर जाता हूं।

 

आंगन में बैठकर अपने बचपन से बातें करना देर तक,

के चांद आकर छत पर बैठ जाता है जब घर जाता हूं।

 

रास्तों ने कदमों को पहचानकर मुझसे कहा हौले से,

बेरंग लौट आता हूं जब भी मैं तुम्हारे घर जाता हूं।

 

आईनों पे लगी धूल साफ करने लगा तो यकीं हुआ,

चेहरा खुद ब खुद खिल उठता है जब घर जाता हूं।

 

मुहब्बत काम से करो मगर इतनी भी नहीं अमन,

मकां के उड़े हुए रंग पूछने लगते हैं जब घर जाता हूं।

अमन का ख्याल…

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