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उपचुनावों के परिणाम ने विपक्षियों को दी संजीवनी

उपचुनावों के परिणाम आने के बाद बीजेपी नेता व केन्द्र सरकार के मंत्रीगण हार मानने को तैयार नहीं है। तरह तरह के बहाने बनाये जा रहे हैं। यूपी में लोकसभा व विधानसभा उपचुनाव में करारी मात खाने के बाद भाजपा में थोड़ी बहुत मायूसी दिख रही है। लेकिन घाघ नेता आज भी अपनी हार को स्वीकार नहीं कर रहे हैं। वह उपचुनाव रिजल्ट को महज इत्तेफाक मान रहे हैं। वहीं विपक्षी दलों के नेता उपचुनाव में मिली सफलता को 2019 की शुरूआत मान रह हैं। सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव विपक्षी दलों की एकता को आगामी चुनाव में भी जारी रखने की बात करते नहीं समा रहे हैं। वहीं रालोद के जयंत चैधरी इसे अपनी खोई भी जमीन फिर से मिलने की बात कह रहे हैं। मायावती भी इस बात को समझ गयी हैं कि यदि विपक्ष एकजुट नहीं हुआ तो भाजपा को केन्द्र में दोबारा सत्ता पाने से नहीं रोका जा सकेगा।

देश के अनेक हिस्सों में उपचुनावों के परिणाम कुछ जगहों को छोड़कर आ चुके हैं। लगभग जगहों पर लोकसभा और विधानसभाओं पर 28 मई को उपचुनाव कराये गये थे। कैराना, गोदिया और नूरपुर में वोटिंग मशीन खराब होने और वीवीपैट में गड़बड़ी की शिकायते ंआई थी। इसलिये वहां पर कुछ मतदान केन्द्रों पर 30 मई को दोबारा मतदान कराये गये। पश्चिम बंगाल, बिहार, यूपी, महाराष्ट्र, पंजाब, उत्तराखंडऔर नगालैंड में लोकसभा और विधानसभा के उपचुनाव संपन्न कराये गये। चुनाव परिणामों में दो जगह ही बीजेपी के प्रत्याशियों को सफलता मिली है। बाकी जगहों पर विपक्षी दलों के प्रत्याशियों को सफलता हाथ लगी है।

यूपी मंे कैराना लोकसभा के उप चुनाव में रालोद प्रत्याशी तबस्सुम ने बीजेपी उम्मीदवार मृगांका सिंह को भारी मतों से हरा कर रालोद का परचम लहरा दिया है। यहां बीजेपी के सांसद हुकुम सिंह का निधन हो गया था जिसकी वजह से उनकी बेटी मृगांका सिंह को टिकट दिया था। पार्टी को ऐसा लग रहा था कि मृगांका को मतदाताओं की सहानुभूति मिलेगी और सीट पर कब्जा बरकरार रहेगा। लेकिन विपक्ष की एकजुटता और जनसंपर्क के आगे उनकी यह चाल सफल नहीं हुई।

तबस्सुम को कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बसपा का समर्थन प्राप्त था। ऐसा ही कुछ हाल नूरपुर विधानसभा पर देखने को मिला वहां भी सपा उम्मीदवार नईमुल हसन ने बीजेपी के प्रत्याशी को पटखनी देते हुए सीट पर विजय हासिल की है। इससे पहले बसपा और सपा ने गठबंधन कर सीएम योगी आदित्याथ की गोरखपुर सीट पर प्रवीण निषाद ने गढ़ को जीता लिया जो कि अजेय माना जाता था। वहीं फूलपुर में उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की सीट पर सपा-बसपा गठबंधन ने भाजपा प्रत्याशी को छठी का दूध याद दिलाते हुए सीट पर कब्जा जता लिया।

इससे भाजपा के खेमे में काफी निराशा देखने को मिली थी। ऐसा माना जा रहा था कि भाजपा व प्रदेश सरकार इस हार से सबक लेते हुए जनहित योजनाओं को जनता तक पहुंचाने का प्रयास करेगी लेकिन कैराना लोकसभा और नूरपुर विधानसभा सीट पर उपचुनाव के दौरान पार्टी और योगी सरकार ने वही गाय, मंदिर और हिन्दुत्व के एजेंडे को भुनाने की कोशिश की लेकिन मतदाताओं ने उनके इस एजेंडे को सिरे से ही नकार दिया।
कुछ लोगों का मानना है कि यदि विपक्ष संयुक्त रूप से चुनाव में उतरेगा तो भाजपा को चुनौती देने में सक्षम रहेगा। ऐसा फूलुपर, गोरखपुर, कैराना और नूरपुर में विपक्षी दलों ने कर दिखाया है। प. बंगाल के महेशतला से टीएमसी के दुलाल दास ने बीजेपी के सुजीत घोष को भारी मतो से हराते हुए जीत हासिल की है। कर्नाटक के राज राजेश्वरी सीट पर भी कांग्रेस के मुनि रत्ना ने भाजपा प्रत्याशी को हरा कर सीट बरकरार रखी है। बिहार के जोकिहाट उपचुनाव में राजद प्रत्याशी शाहनवाज आलम ने जेडीयू प्रत्याशी को हरा कर बीजेपी-जदयू सरकार की पेशानी पर सिलवटें डाल दी हैं।

भाजपा को महाराष्ट्र के पालघर में ही जीत हासिल हो सकी है। वहां गवित राजेंद्र ने बीजेपी के टिकट पर शिवसेना के उम्मीदवार को हरा कर जीत का स्वाद चखा है। राजेंद्र हाल ही में कांग्रेस छोड कर बीजेपी में शामिल हुए हैं। गवित कांग्रेस के दिग्गज और लोकप्रिय नेता माने जाते थे। भाजपा ने उन्हें पार्टी में शामिल कर पालघर से टिकट दिया और अपनी सीट पर कब्जा बरकरार रखा।

लोगों की यह धारणा बनती जा रही है कि मोदी सरकार के चार साल बाद पीएम मोदी का जादू उतरता जा रहा है। उसी का असर उपचुुनावों में दिखने लगा है। राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और मिजोरम में विपक्षियों की यह एकजुटता बनी रही और कांग्रेस सभी दलों को लेकर साथ चली तो मोदी दोबारा सत्ता में आसानी से नहीं आ पायेंगे। इस बात को लेकर पार्टी और सरकार दोनों ही चिंतन मनन करने में लगे हैं। लेकिन सार्वजनिक तौर पर वो निश्चिंत होने का दावा करते नजर आते हैं।

विनय गोयल के विचार

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