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वो दिन भी क्या दिन थेः रामलीला व दशहरे का रहता था इंतजार

बात उन दिनों की है जब मैं कानपुर में अपने परिवार के साथ रहता था। हम सभी भाई बहनों को बेसब्री से इंतजार रहता था। खासतौर से दशहरे का। वो इस लिये कि घर वाले पूरे दस दिनों तक हमें रात में घूमने की छूट देते थे। घर के आसपास मिलीजुली कम्युनिटी के लोग रहते थे। उनमें मुस्लिम भी थे। मेरे कुछ दोस्त मुस्लिम भी थे। हम सभी लगभग हमउम्र थे। हमारे बीच किसी भी प्रकार की धर्म को लेकर कोई दुराव नहीं था। सब एक दूसरे के घरों में बिना झिझक आते जाते थे। मेरे घर वाले भी काफी खुले और आधुनिक विचारधारा के थे। हम सब लोग एक दूसरे के खास कार्यक्रमों भी बेझिझक भाग लेते थे। आज भी जब मैं कानपुर जाता हूं तो उन दोस्तों से मुलाकात होती है। मुझे तो आज भी वैसा ही महसूस होता है जैसा कि आज से तीस साल पहले होता था।
दशहरे व नवरात्र के आने के पहले से ही हमलोगों की टोली पहले से ही मौज मस्ती करने का प्लान तैयार करने लगते थे। आठ दस लोगों के ग्रुप हम लोगों की बहनें भी शामिल रहती थीं। लेकिन उनका साथ केवल रामलीला ग्राउन्ड और पूजा के पांडालों तक ही रहती थी। घर से हम लोग साथ ही निकलते थे। लड़कियों में इस बात की इच्छा रहती थी कि राम लीला को करीब से देखा जाये इस लिये। लीला शुरू होने से काफी पहले घर से बोरियां लेकर कर मंच के पास जा कर बैठ जाती थीं। उस समय हम लोग लीला करने वाले कलाकारों को सचमुच का भगवान कर श्रद्धा से देखते थे। हम लोगों को खासतौर सीता स्वयंवर और लक्ष्मण शक्ति वाले दिन का विशेष इंतजार रहता था। क्योंकि उन दिनों फिल्मों का बड़ा के्रज रहता था। इसके अलावा आज की तरह टीवी पर इतने कार्यक्रम और फिल्मों का प्रसारण नहीं हुआ करती थी। आमतौर पर हम लोगों को फिल्म देखने के लिये पैसे और अनुमति दोनों ही नहीं मिलती थीं। लड़कियां रामलीला देखने जाती तो अपने खाने के लिये मूंगफली और कैथा खरीद लेती जो तीन घंटों के लिये काफी होते थे। लड़के जहां फिल्म देखने के लिये उतावले रहते वहीं लडकियां चाट पकौड़ी खाने की शौकीन होती थीं। कुछ लड़कियां मौका पाकर अपने प्रेमियों से भी मिलने का मौका पा जाती थी। उन दिनों ऐसे लड़के लड़कियां खूब नैन मटक्का किया करते थे। उन दिनों आजकल की तरह इतना क्राइम नहीं होता था। रात के दो तीन बजे तक लड़कियां लीला देख कर वापस अपने घरों को सुरक्षित पहुंच जाती थी। जिन लड़कों की कोई सेटिंग नहीं होती वो सिर्फ ताड़ने के लिये ही रामलीला पार्क जाते थे।
मैं वहीं के एक स्कूल में सातवीं क्लास में पढ़ता था। आसपास के बच्चे ही उस स्कूल में पढ़ते थे। लड़के लड़कियां एक ही साथ पढ़ते थे। रामलीला के दौरान अपने क्लास की लड़कियों देखने की इच्छा मेरी भी हुआ करती थी। हमारी तरह क्लास कुछ लड़कियां रामलीला देखने अपने परिवार के साथ आया करती थी। परशुराम लक्ष्मण संवाद वाले दिन सुबह तक लीला का मंचन हुआ करता था। ऐसे में क्लास की एक दो लड़कियां जरूर देखने को मिल जाती थी। उनको देखने की तो इच्छदा रहती लेकिन करीब आने के बाद भी उनसे कुछ कहने की हिम्मत नहीं होती थी। इसके पीछे एक कारण यह भी था कि मम्मी स्कूल में टीचर थी। अगर शिकायत हुई बेभाव की पिटाई होना तो निश्चित था। उन दिनों के बच्चों को आजकल के बच्चों की तरह इतनी बातों की जानकारी नहीं थी। तब हम लड़कों को अपने दिल की बात कहने के लिये सिर्फ लव लैटर ही एक मात्र साधन हुआ करता था। लेकिन उसमें भी काफी खतरा रहता था। कहीं लड़की ने पत्र लेने से इनकार कर दिया। लैटर उसके भाई या घर वालों के हाथ लग गया तो वो जूता पूजन होता कि रूह फना हो जाती। एक दो बार ऐसे हादसे हम लोग देख चुके थे। लव लैटर देने जैसी हिमाकत करना तो मेरे में बिल्कुल भी नहीं थी।
जेब खर्च के लिये बहुत मुश्किल से 25 पैसे मिला करते थे। मेला देखने जाने के लिये अगर एक रुपया अगर मिल जाता तो हम अपने को राजा समझने लगते थे। उस समय 25 पैसे में भी हम लोग समोसा और आलू टिक्की खरीद लेते थे। स्कूल जाते समय हम लोगों को पांच पैसे मिलते थे। फिल्म देखने के लिये कम से कम सवा रुपये तो होने ही चाहिये थे। इतने में सबसे आगे बैठ कर फिल्म देखने को मिल जाती थी। फिल्म देखने के लिये मुझे अपने छोटे भाई पर निर्भर रहना पड़ता था। वह बहुत थी जुगाड़बाज था। पढ़ने में उसका कम ही मन लगता था तो पापा ने उसे छोटा मोटा बिजनेस करवा दिया था। उसी में हेरफेर कर फिल्म देखने का जुगाड़ हो जाया करता था। वैसे तो हमारे पापा खुद भी फिल्मों के शौकीन थे। लेकिन उनसे फिल्मों के लिये पैसे मांगना शेर के मुंह में सिर देने के बराबर होता था। मम्मी की भी पैसे देने की एक हद थी जो वो अक्सर देती भी थी।
फिल्म देखने के बाद हम लोग वापस अपने मोहल्ले की औरतों वाली टोली में शामिल हो जाया करते थे। यह सिद्ध करने के लिये कि हम लोग भी रामलीला देख रहे थे। वैसे कभी हमारे घर वालों को फिल्म देखने वाली बात आज तक नहीं पता चली। अगर पता चल जाता पापा का जूता होता और हमारा सिर।
विनय गोयल के विचार

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