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सोच का दायरा आखिर बनता क्यों हैं?

कहने को तो लोग बड़े ही गर्व से कह देते हैं कि वो 21वीं सदी में रहते है, मगर क्या कभी किसी ने इस बात पर गौर किया है कि भले ही हम 21वीं सदी में रह रहे हो लेकिन आज भी कुछ लोगों की सोच हमे सोचने पर मजबूर कर देती है कि, क्या सचमुच हम 21वीं सदी में ही रहते हैं।

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मेरा ऐसा कहने का तात्पर्य सिर्फ इतना ही है कि क्यूं हमें हमारी सोच का दायरा बता दिया जाता है, जिस दायरे के आगे हम जाए तो हम पर गर्मजोशी या जवानी का जोश जैसे तंज कसे जाते है। कहने को तो हम आजाद देश के निवासी हैं जहां हमे Freedom Of Speech And Expression… जैसे ही कुछ मौलिक अधिकार मिले हुए है लेकिन इन अधिकारों का फायदा क्या? क्योंकि इन अधिकारों के उपर तो समाज क्या कहेगा, लोग क्या सोचेगे जैसी कुछ चीजें हावी होती नजर आ रही हैं।

अगर ये केवल तंज है तो तंज ही सही, लेकिन मेरा ये तंज हर उस शख्स पर है जो किसी की सोचने का दायरा तय करता हैं… आज भी वो दौर हैं, जहां आए दिन सुना जाता है कि, मै एक क्रिकेटर बनना चाहता था, मैं एक सिंगर बनना चाहता था… मगर मेरे घरवालों को मंजूर ना था।

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जरा सोचिए कि अगर सदी के महानायक माने जाने वाले अमिताभ बच्चन जी को अगर एक्टिंग से रोका जाता तो क्या हमें उनके जैसा अभिनेता या वैसी ही कोई बुलंद आवाज मिल पाती, अगर क्रिकेट के भगवान माने जाने वाले सचिन के पिता ने भी कह दिया होता कि नही तुम डॉक्टर बनो तो क्या आज कोई सचिन होता, साथ ही सोचिए कि अगर स्वर कोकिला कही जाने वाली लता मंगेशकर के पिता ने भी कह दिया होता कि तुम सिंगर नही कुछ और करो तो क्या हमे लता जी जैसी कोई मधुर आवाज मिल पाती।

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कही-न-नही सोच का दायरा तो वहीं खत्म हो जाता है, जहां समाज की बात आ जाए, मगर क्यूं हम समाज के बारे में सोचकर ही अपने सपनों की उडान भरे। एक कथन है कि जितने मुंह उतनी बाते, तो क्यू किसी के बारे में सोचकर, हम अपने सपनो को बली चढ़ा दे। कब तक हम दूसरो के उदाहरण से जाने जाए, हमें कही-न-कही अपनी वही पहचान बनानी होगी जो सचिन, लता जी और अमिताभ बच्चन ने बनाई है।

लेखक अजय यादव के अपने निजी विचार…

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