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इहलोक से कूच कर गये अटल!

नयी दिल्ली। 93 साल की उम्र में भारत रत्न और देश के पूर्व प्रधानमंत्री देशवासियों और पार्टीजनों को रोता बिलखता छोड़ गये। पिछले काफी समय से अटलजी एकाकी जीवन व्यतीत कर रहे थे। उनके दोनो ही घुटनों को बदला जा चुका था। सार्वजनिक जीवन से उनका कोई वास्ता नहीं रह गया था। गाहे बगाहे पार्ट के वरिष्ठ नेता व सरकार के मंत्रिगण हाल चाल पूछने सिर्फ शिष्टाचार निभाने उनके आवास पर पहुंच जाते थे। चलो इस शिष्टाचार से भी लोगों को मुक्ति मिल गयी। लेकिन आखिर के ये आठ दस साल अटल जी ने किस तरह काटे यह सिर्फ अटल जी ही समझ सकते हैं। कहने को तो अटल जी ने पार्टी को फर्श से फर्श पर पहुंचाने में अपना सारा जीवन ही लगा दिया। उनके नेतृत्व में तीन बार केन्द्र में बीजेपी की सरकार बनी वो बात अलग है कि दो बार का कार्यकाल कुछ खास नहीं रहा। लेकिन ये अटलजी ही थे जिनकी साख विरोधी दल के नेता भी मानते थे। कोई भी उनकी आलोचना नहीं करता था। अगर कोई करता भी था तो वो उसे बड़े ही हल्के फल्के अंदाज में मुस्कराते हुए स्वीकारते थे। अहंकार और घमंड उनके अंदर रंचमात्र भी नही था। भाषा इतनी सरल और मीठी होती कि सामने वाला गदगद हो उठता था। सामने वाला किस हैसियत का है उन्हें इससे कोई सरोकार नहीं होता था।

बात उन दिनों की है जब मैं लखनऊ में पत्रकारिता का ककहरा पढ़ रहा था। शुरुआत मैंने 1996 में दैनिक हिन्दुस्तान से विधिवत की थी। सही मायने में मैंने पत्रकारिता स्वतत्र चेतना से की जहां मुझे डेस्क पर नियुक्त किया गया था लेकिन वहां मन रास नही आया और दो तीन महीनों में ही काम छोड़ दिया। कुछ दिनों तक मैंने स्वतंत्र रूप से लेखन कार्य किया। मेरे लेख हिन्दुस्तान समाचार एजेंसी और राष्ट्रीय समाचार एवं फीचर्स नेटवर्क में प्रमुखता से छपने लगे थे। इन्ही दिनों अक्टूबर 1996 में हिन्दुस्तान का लखनऊ संस्करण लांच हुआ। उसके स्थानीय संपादक सुनील दुबे जी थे। उन्होंने मुझे प्रशिक्षु स्थानीय संवाददाता के रूप में मौका दिया। इसी दौरान मुझे अटलजी का सानिध्य प्राप्त हुआ। तब अटलजी लखनऊ से सांसद थे। उनके प्रधानमंत्री बनने का किसी को गुमान भी न था। यूपी की राजधानी लखनऊ के महानगर इलाके में साईं बाबा एक समारोह था। उस समारोह में अटल जी भी आये हुए थे। इस कार्यक्रम की कवरेज मुझे करने की जिम्मेदारी मुझे सौंपी गयी थी। इससे पहले अटल को मैंने सिर्फ अखबारों और पत्रिकाओं में ही देखा था। मेरे लिये यह एक ऐतिहासिक अवसर था कि अटल जैसे व्यक्तित्व को इतने करीब से देखने का।

संगमरमर के फर्श पर अटल जी बड़ी ही गंभीर मुद्रा में आंखें बंद कर बैठे हुए थे। उन्होंने खादी का कुर्ता और सफेद धोती पहनी हुई थी। उस कमरे में बहुत ही चुने हुए लोग वहां मौजूद थे। वहां का माहौल इतना गंभीर था कि मुझे अटल जी से बात करने की हिम्मत भी नहीं हो रही थी। लगभग 15 मिनट तक वो आंखें बंद कर बंद कर बैठे रहे। किसी ने कुछ पूछा तो बहुत संक्षिप्त और गंभीर मुद्रा में जवाब दे दिया। बहुत सधे हुए शब्दों में उन्होंने कार्यक्रम के बारे में कहा और फिर एक बार शांतिपूर्ण मुद्रा में आंखें बंद कर विचारों मे डूब गये। ये मेरे जैसे नौसिखिया पत्रकार के लिये किसी गौरवशाली स्वप्न के जैसा था। उन पलो को याद कर आज भी मैं रोमांचित हो उठता हूं। उन जैसे महान व्यक्ति को श्रद्धांजलि देने के लिये मेरे पास कोई शब्द नहीं हैं। उनके बारे में टीवी चैनल्स और समाचार पत्रों में काफी कुछ लिखा जा रहा है। मैं इतना बड़ा और नामचीन पत्रकार नहीं हूं कि उनके बारे में कुछ लिखूं। मैं तो सिर्फ इतना कह सकता हूं कि उनके जैसा राजनीतिक व्यक्तित्व मेरे जीवन में नहीं आया है। आज के राजनेताओं से खासतौर से बीजेपी के नेताओं को बहुत कुछ सीखने की जरूरत है।

विनय गोयल

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