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इरोम शर्मिला का बलिदान क्या कहता है

महज 28 साल की उम्र जिस उम्र में लड़कियॉ अपने सपने सहेजती है….अपने आने वाले कल के बारे में सोचती हैं….उस उम्र में मणिपुर की एक महिला इरोम शर्मिला ने 16 सालों तक अनशन किया और तपस्वी बन गई। किस के लिए बस और बस आम लोगों के लिए।
16 सालों तक भूखी प्यासी रही इरोम और इस बीच 28 से 45 साल की हो गई इरोम, पर क्यों अपने लिए जी नहीं, अपनो के लिए नही, अपने वहां पर रह रहे बस आम लोगों के लिए।

इरोम की बस इतनी सी मांग थी की वह जिस जमींन पर रहती है, वहां के लोगों के लिए कुछ कर सके उन पर होते अत्याचार बंद करवा सके।
इरोम बस इतना चाहती थी की उनके राज्य मणिपूर से अफस्पा कानून हटा लिया जाए।. जिसके अनुसार सुरक्षा बलों को सिर्फ शक के बिना पर ही किसी को भी गिरफ्तार कर लेने और गोली मारने तक की इजाजत देता है।

और इस बात के लिए महज 28 साल की युवती 16 सालों तक लड़ती रही, इस दौरान इरोम के तीन ठिकाने हुआ करते थे, अस्पताल, जेल, या फिर अदालत। इन घटनाओं के बाद बहुत से लोग उन्हें अपना आर्दश मानने लगे, उन्हें आइरन लेडी के नाम से पूकारने लगे।
अगस्त 2016 में इरोम ने भूख हड़ताल खत्म करने का ऐलान किया और उन्होने ऐलान किया कि वह अब चुनाव लड़ेगी। शायद उन्हें आम लोगों से मिल रहे प्यार का कुछ ज्यादा ही भरोसा था। लेकिन आपको पता है कि उन्हे महज 90 वोट मिलें इसे हम क्या कहेंगे, इसे हम कहेंगे भारतीय राजनीति।

11 मार्च 2017 को मणिपुर के थोबल सीट से इरोम को महज 90 वोट मिलें। इस सीट के लिए जितने भी उम्मीदवार थे उन सभी में से इरोम वोट पाने वालो में से सबसे आखिरी पायदान पर थी।
चुनाव नतीजो के तुंरत बाद उन्होने अपनी पीड़ा भी व्यक्त की, उन्होने कहा की मैं जैसी हूं, उस तरह लोगों ने मुझे स्वीकार नही किया, ऐसे में मैं खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही हूं। मैं अब राजनीति में बुरी तरह से थक गई हूं, इसलिए अगले कुछ दिनों तक का समय मैं आश्रम में रहकर बिताना चाहती हूं।

अगर हम कहें की एक बार फिर इरोम बिल्कुल अलग-थलग महसूस कर रही हैं तो गलत नही होगा।
इरोम ने कहा है की बीजेपी ने अपने पैसों के दम पर चुनाव जीता है, अब वजह चाहे जो भी हो पर सच तो यही है न की इरोम को जनता ने स्वीकार नही किया इललिए उन्हे महज 90 वोट मिलें।

इरोम की ईमानदारी भाजपा-कांग्रेस के भारी भरकम संसाधनों के बीच दम तोड गई। इरोम और उनके साथियों की ईमानदारी, त्याग, जनता को अपनी ओर खींच ना सका। यही है, भारतीय राजनीति का असली चेहरा, कहना चाहूंगी की पैसो की है कीमत यहां पर इंसान की कीमत कोई नहीं, यह भारतीय राजनीति है जनाब जहां राजनीति में ईमानदारी, त्याग की कोई भी कीमत है ही नहीं।
अनीता झा के विचार

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