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जब पाठशालाआें पर भारी पड़ी अंग्रेजी हुकूमत

इस देश में शिक्षा तो उसी दिन राज-व्यवस्था के हाथ का खिलौना बन गयी, जिस दिन स्वायत्त पाठशाला व्यवस्था को भंग करने के लिए ब्रिटिश कम्पनी हुकूमत ने अंग्रेजी केन्द्रित स्कूली व्यवस्था की नीव डाली थी । स्कूली और विश्वविद्यालयी शिक्षा का वर्तमान ढाँचा कम्पनी एवं ब्रिटिश राज में खड़ा किया गया है और आज भी तमाम सतही प्रयासों के बावजूद भी औपनिवेशिक जरूरत के अनुरूप ही है। औपचारिक शिक्षा के संस्थान के रूप में स्कूल और विश्वविद्यालय राजसत्ता की उप व्यवस्था ही है और ये राजसत्ता की जरूरत के अनुरूप सामाजिक स्तरीकरण का काम करते हैं ।

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अतः स्कूल इसलिए इंग्लिश मीडियम हैं क्योंकि राजसत्ता इंग्लिश मीडियम है और राजसत्ता इसलिए इंग्लिश मीडियम है क्योंकि ‘परदेशी इंग्लिश’ राजसत्ता को एक दो प्रतिशत इंग्लिश-हिंग्लिश लोगों तक समेटे रखने का सबसे आसान और कारगर साधन है। इंग्लिश सिर्फ भाषा नहीं है, यह तो शासक और शासितों के मध्य अन्तर बनाने का साधन भी है। अतः इंग्लिश हम भारत के लोगों को न केवल नियंत्रित अपितु भ्रमित रखने का सबसे आसान साधन है।

जब तक राजसत्ता इंग्लिश मीडियम है, तब तक साँस्कृतिक भाषाओं में समान स्कूली व्यवस्था की बात सोचना तक बेवकूफी है। जब तक राजसत्ता इंग्लिश मीडियम है, बच्चों की सांस्कृतिक परिवेश में बाल केन्द्रित रचनात्मक एवं विवेचनात्मक शिक्षाशास्त्र की बात हम भारत के लोगों के साथ बेईमानी और धोखा है। जब तक राजसत्ता इंग्लिश मीडियम है, शिक्षा का सार्वभौमिकरण (संविधान का अनुच्छेद 21A) महज़ एक युटोपिया है।

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कॉमन स्कूल की लड़ाई को खतम कर उसकी आड़ में इंग्लिश मीडियम प्राईवेट स्कूलों में 25% EWS कोटे की दुकानदारी है। जब तक राजसत्ता इंग्लिश मीडियम है, तब तक इंग्लिश मीडियम स्कूलों की भेड़ चाल को रोक पाना असंभव ही नहीं नामुमकिन भी है। अतः जब तक उच्च शिक्षा की व्यवस्था इंग्लिश मीडियम है तब तक राजव्यवस्था 1-2% अंग्रेजी-भाषी लोगों के हाथों में सुरक्षित है। अतः जन शिक्षा को मुक्तिदाई, काम आधारित रचनात्मक एवं विवेचनात्मक बनाने के लिए राजसत्ता को इंग्लिश मीडियम के नियंत्रण से मुक्त करने की जरूरत है।

लेखक अश्विनी कुमार

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