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आज के युवाओं में डिप्रेशन क्यों

आज से दो तीन दशकों पहले मानसिक तनाव, अवसाद या डिप्रेशन आदि सुना भी नहीं जाता था। लेकिन आज मेट्रो सिटीज में अक्सर सुना जाता है कि युवावर्ग डिप्रेशन का शिकार हो रहे हैं। मानसिक तनाव और अवसाद से प्रभावित होकर अपनी जान देने की कोशिश कर रहे हैं। डिप्रेशन, तनाव या अवसाद आज भी ग्रामीण इलाकों में कम देखा जाता है। ऐसा इसलिये क्यां बड़े शहरों के मुकाबले वहां के युवाओं में प्रतिस्पर्धा की भावना इतनी बलवती नहीं होती है जितनी कि मेट्रो सिटीज के युवाओं में। जीवन का लक्ष्य तय करने की इतनी मारामारी बड़े शहरों में होती है उतनी गांवों में नहीं देखी जाती है।
बड़े शहरों में बच्चों में प्रतिस्पर्धा की दौड़ प्रारंभिक शिक्षा के दौर से शुरू हो जाती है। नर्सरी क्लास में पढ़ने वाले बच्चों को अपने साथियों से आगे रहने की होड़ रहती है। ज्यों ज्यों पढ़ाई का स्तर बढ़ता जाता है स्पर्धा का स्तर बढ़ता जाता है। बच्चों की पढ़ाई से माता पिता अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा का सवाल बना लेते हैं। ऐसे में बच्चों में एक प्रकार का भय सताने लगता है। पढ़ाई को मां बाप सोशल स्टेटस बना लेते हैं। पढ़ने में पिछड़ने वाले बच्चे घर समाज में वो प्यार व सम्मान नहीं पाते हैं जिसके वो अधिकारी होते हैं। एक क्लास में पढ़ने वाले सभी बच्चे तो टॉप नहीं कर सकते किसी को तो उसके पीछे खड़ा होना पड़ेगा।
हमें इस बात पर गौर करना पड़ेगा कि क्या वजह है कि युवा आजकल इतना स्ट्रैस और डिप्रेशन में क्यों रहते हैं। इसका मूल कारण है कि आज का युवा खाने पीने का शौकीन होता जा रहा है लेकिन उस अनुपात में फिजिकली ऐक्टिव नहीं रहता है। इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स पर ज्यादा बिजी रहता है। लोगों को समझना चाहिये कि शरीर में रासायनिक संतुलन बनाये रखने के लिये गतिशील होना बहुत जरूरी है। आज से 10-15 साल पहले बहुत ही फिजिकली फिट रहते थे। सुबह से शाम तक शारीरिक रूप से अधिक गतिशील रहते थे। उनमें डिप्रेशन और तनाव की शिकायत कम होती थी। आज शारीरिक रसायन के संतुलन को बेहतर बनाना मुश्किल होता जा रहा है।
मानसिक तनाव डिप्रेशन का पहला चरण होता है इससे प्रभावित लोग एकांत प्रिय हो जाते हैं। लोग ऐसे लोगों को सनकी समझने लगते हैं और ऐसे लोग हिंसक हो जाते हैं। समय बीतने के साथ लोग डिप्रेशन में चले जाते हैं। शुरुआत में दवा व इंजेक्शन देकर हालात पर काबू पाया जा सकता है। इससे हालात काबू नहीं हुए तो लोबोटॉमी की जरूरत होगी। इसलिये युवाओं को निराशा और अवसाद से बचने के लिये गतिशील होना ही पड़ेगा। कम उम्र के बच्चों को भी ऐसे दौड़ भाग वाले खेलों को अपनाना चाहिये जिससे शारीरिक रसायन का संतुलन बना रहे और निराशा और तनाव से दूर रहें। सभी उम्र के लोगों को प्रकृति में रह कर कुछ समय बिताना चाहिये। जहां उन्हें सूर्य की रोशनी, ताजी हवा और आकाश का साथ मिल सके।
विनय गोयल के विचार

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