भारत में स्वास्थ्य पर सिर्फ राजनीति !

संसद की रिपोर्ट में बीते 18 जुलाई से सदन का मानसून सत्र शुरू हो चूका हैं बीते एक सप्ताह सदन का हंगामे-दार रहा लेकिन आज जिक्र सदन में पेश उस विधेयक की जो इस सप्ताह चर्चा का विषय बना और देश के सामने एक विमर्श छोड़ कर गया वो विधेयक हैं कौन सा चलिए चर्चा शुरू करते हैं….. शुक्रवार को देश की संसद में एक प्राइवेट मेम्बर बिल पेश हुआ, विधेयक का नाम था. स्वास्थ्य का अधिकार विधेयक 2021 और विधेयक पेश किया RJD के सांसद मनोज झा ने. बिल को पेश करते हुए मनोज झा ने कहा की ये बिल मैं पेश कर रहा हु. लेकिन इस बिल का जन्म सामूहिक सोच, सामूहिक दृष्टिकोण और सामूहिक प्रसंग के कारण हुआ हैं.

स्वास्थ्य का अधिकार विधेयक 2021 प्राइवेट मेम्बर बिल पर चर्चा करते हुए, भाजपा सांसद राकेश सिन्हा ने कहा की इस देश में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के आने से पहले सिर्फ 1एम्स था. वाजपेयी सरकार ने 6 एम्स की अनुशंसा की थी उसके बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 16 एम्स कि स्थापना कर दी और आने वाले समय में ये 16 एम्स की संख्या 22 होने की उम्मीद हैं. अब किसी को भी इलाज कराने के लिए दिल्ली नहीं आना पड़ेगा ये राईट तो हेल्थ नहीं तो क्या हैं.

अब चर्चा इस बिल पर कर लेते हैं कि आखिर इस बिल में अहम बाते क्या हैं फिर प्रकाश डालेंगे की आखिर भारत में राईट तो हेल्थ की राह कितनी आसान और कठिन हैं. इस विधेयक में प्रमुख बात ये हैं कि स्वास्थ्य के अधिकार को मौलिक अधिकार का दर्जा दिया जाए जैसे की भारत में 14 वर्ष तक के आयु के बच्चो के लिए शिक्षा को एक मौलिक अधिकार बनाया गया हैं. बिल में इस बात को भी कहा गया हैं की स्वास्थ्य का अधिकार अनुच्छेद 21 से जुडा हुआ मसला हैं. प्रस्तुत विधेयक में ये भी कहा गया हैं की ये मसला निति निदेशक तत्व के अनुच्छेद 42 मानवेचित और न्यायसंगत दशाएं प्रदान करना अनुच्छेद 47 पोषण स्तर को बढ़ाया जाना अनुच्छेद 39,38 और 43 सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया हैं. बिल में स्वास्थ्य के प्रति भारत की अन्तराष्ट्रीय प्रतिबद्धता को भी रेंखाकित किया गया है. प्रस्थापित विधेयक में अन्तराष्ट्रीय प्रतिबद्धता की बात करते हुए भारत सरकार का ध्यान मानवधिकारो की सार्वभौम घोषणा (UDHR) के अनुच्छेद 25(1) आर्थिक सामाजिक और सांकृतिक अधिकारों संबंधी अन्तराष्ट्रीय अभिसमय अनुच्छेद 12 ट्रिप्स करार एवं जन स्वास्थ्य संबंधी विश्व व्यापार संगठन की दोहा घोषणा (2001) अन्तराष्ट्रीय स्वास्थ्य विनियम जैसे तमाम अन्तराष्ट्रीय प्रतिबद्धता की और आकर्षित करने का प्रयास किया गया है. स्वास्थ्य का अधिकार विधेयक 2021 की बात करते हुए जिन मुख्य बिंदु को इसमें समायोजित करने के लिए कहा गया हैं, उसमे मुख्य तौर पर भोजन का अधिकार, जल का अधिकार, सफाई का अधिकार, रोगोपचार का अधिकार स्वास्थ्य देखरेख का अधिकार सड़क सुरक्षा का अधिकार व्यावसायिक सुरक्षा का अधिकार शामिल हैं. लेकिन गौर करने वाली बात हैं कि इस संसदीय विधेयक 2021 को पेश करते हुए जिस मौलिक अधिकार का जिक्र किया हैं उसकी व्याख्या में स्वास्थ्य निहित तो हैं लेकिन व्यापक रूप से परिभाषित नहीं हैं. अनुच्छेद 21 मुख्य रूप से सम्मान पूर्वक जीवन जीने का अधिकार और निजता का सवैधानिक मौलिक अधिकार देता हैं. अनुच्छेद 21 में जीवन जीने के लिए मुख्य रूप से आर्थिक और रोजगार सुविधा पर जोर दिया गया हैं. अनुच्छेद 21 में परिभाषित किया गया हैं कि आपको संविधान का ये अनुच्छेद कार्यपालिका और विधायिका के मनमाने तरीके से किये जा रहे कार्यवाही से संरक्षण प्रदान करेगा. प्रसिद्ध फ्रांसिस वर्सिस यूनियन टेरिटरी दिल्ली जजमेंट में भी सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि भारतीय नागरिक को गरिमामय और मानवतापूर्ण जीवन जीने का अधिकार हैं. इसमें भी आधार मुख्य तौर पर आर्थिक ही था. प्रसिद्ध पेवमेंट डवेलेर केस में भी सुप्रीम ने व्याख्या करते हुए कहा था कि अगर आपको किसी को गरिमामय जीवन जीने से वंचित करना हैं तो आप उसकी न्यनूतम मानदेय यानि सैलरी को रोक लीजिये या खत्म कर दीजिये. अनुच्छेद 21 में जो जीवन शब्द हैं उसको प्रमुख रूप से आजीविका से जोड़ा गया हैं. यानि की अगर किसी का सम्मानपूर्वक और गरिमामय जीवन खत्म करना हैं तो आप उसकी आजीविका का साधन छीन लीजिये. इसलिए जीवन जीने के अधिकार में आजीविका के अधिकार को उसका प्रमुख अंग माना गया हैं न की स्वास्थ्य को. अनुच्छेद 21 के मूल में भारत के नागरिक के लिए अर्थतंत्र हैं न की व्यापक स्तर स्वास्थ्य-तंत्र. जहा तक निति निदेशक तत्व और अन्तराष्ट्रीय प्रतिबद्धता की बात हैं तो सरकार की वो नैतिक जिम्मेवारी हैं. लेकिन सरकार को इस कार्य के लिए कोई भी व्यक्ति या न्यायिक संस्था बाध्य नहीं कर सकती हैं. सरकार इस कार्य को करेगी लेकिन संसाधन की पर्याप्त उपलब्धता होने पर अगर संघ सरकार के पास प्रस्तावित विषय से महत्वपूर्ण विषय कार्य करने के लिए हैं तो संघ सरकार पहले उस विषय को पूरा करेगी फिर इस विषय पर ध्यान आकर्षित करेगी. इसलिए संवैधानिक कसौटी पर अभी ये बिल कई उलझनों में उलझ सकता हैं ओर प्राइवेट मेम्बर बिल का इतिहास तो हम सबको पता ही हैं. क्यूंकि आजाद भारत के इतिहास में मात्र 14 प्राइवेट मेम्बर बिल ही सदन से पास हुए हैं. देश की 16 वीं लोकसभा में कुल 999 प्राइवेट मेंबर बिल पेश किए गए थे, इस दौरान मात्र 4 फीसदी बिल पर चर्चा हुई, जबकि 96 फीसदी बिल बिना चर्चा के ही बाहर हो गए.

दर्शको बात चली हैं तो देश में स्थापित आधारभूत स्वास्थ्य संरचना की बात कर लेते हैं. अभी देश कोरोना महामारी की चपेट में हैं और हम इससे अभी मुक्त नहीं हुए हैं. अगर कोरोना महामारी नहीं आती तो हमें कभी पता ही नहीं चल पाता की स्वास्थ्य क्षेत्र में हमारी क्या कमिया हैं. जब कोरोना महामारी थी तो सब जगह कर्फ्यू की शांति थी लेकिन उस शांति को चीर रही रही थी अस्पताल, कोरोना रोधी दवाओ और ऑक्सीजन के लिए पीड़ित परिवार जनों की असहाय चीख पुकार. अब अगर बात करे तो भारत अपने कुल सकल घरेलू उत्पाद का मात्र 3.56 फीसद ही स्वास्थ्य पर खर्च करता हैं. राज्यसभा में सरकार के एक बयान के अनुसार भारत में 1445 लोगो पर सिर्फ एक डॉक्टर हैं जब की विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार प्रति हजार व्यक्ति पर एक डॉक्टर कि आवश्यकता हैं. अगर देश भर में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और प्राइमरी हेल्थ सेंटर की बात करे तो …………. देश की ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र बहुत महत्व रखते हैं. लेकिन इन स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की 82 फीसदी कमी है. आईपीएचएस मानदंडों के आधार पर देखें तो वर्ष 2019 के दौरान इन केंद्रों में सर्जनों की कमी 85.6 फीसदी, प्रसूति एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ की 75 फीसदी, चिकित्सक 87.2 फीसदी और बाल रोग विशेषज्ञों की 79.9 फीसदी की कमी दर्ज की गयी थी, यह जानकारी तत्कालीन केंद्रीय स्वास्थ्य राज्यमंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने राज्य सभा में दिए गए एक प्रश्न के जवाब में दी. देश के कम्युनिटी हेल्थ सेंटर्स में कुल मिलकर 21,340 विशेषज्ञों की जरुरत है. जिनमें से केवल 3,881 ही उपलब्ध है. जबकि 17,459 की कमी है. अगर देश भर में प्राइमरी हेल्थ सेंटर की बात करे तो या भी स्थिति दयनीय बनी हुई हैं. देश के कुल 25,650 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में से 15,700 (61.2%) में केवल एक ही डॉक्टर उपलब्ध है और 1,974 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में तो एक भी डॉक्टर नहीं है. प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र लगभग 20,000 -30,000 आबादी के लिये बनाया जाता है. स्वास्थ्य को मौलिक अधिकार बनाने से पहले हमें स्वास्थ्य से जुड़े बुनियादी ढ़ाचे को मजबूत करना होगा, जिसमे लगभग 5 लाख करोड़ से अधिक के अतिरिक्त वित्तीय प्रबंधन कि आवश्यकता हैं. भारत सरकार ने कोरोना महामारी के समय कमियों को दुर करने के लिए स्वास्थ्य के क्षेत्र में वर्ष 2021 – 2022 के बजट में 137 प्रतिशत वृद्धि का प्रावधान किया था. जिसके तहत 2,23,846 करोड़ का प्रावधान किया गया था. लेकिन इसमें विधेयक में अड़चन क्या आ सकती हैं ? इस बात पर भी चर्चा करना आवश्यक हैं. अगर भारत के संघीय ढ़ाचे को देखे तो भारत में स्वास्थ्य का विषय राज्य का है. केंद्र इसमें तभी हस्ताक्षेप कर सकता हैं जब महामारी जैसी स्थिति पैदा हो जाए जैसे की कोरोना महामारी, उस समय NDMA पुरे देश पर लागु था और संघ के सभी राज्य इसको मानने के लिए बाध्य भी थे. लेकिन राज्य में स्वास्थ्य सुविधा कैसे बेहतर हो इसकी देखरेख राज्य सरकार ही करेगी, हा केंद्र दिशा-निर्देश इस बाबत जारी कर सकता हैं. लेकिन राज्य सरकारों को उस निर्देश को अपने राज्य में उपलब्ध संसधानो के हिसाब से लागू करने की पूरी आजादी होती हैं. स्वास्थ्य को मौलिक अधिकार में परिवर्तित करने से राज्य सरकार पर एक जिम्मेवारी का भार आ जायेगा जिसे उसे हर हाल में पूरा करना ही होगा और अगर नहीं करता हैं तो उसे समय-समय पर न्यायिक चुनौती का सामना करना पड़ता रहेगा. बिल में स्वास्थ्य अधिकार के भीतर जिन विषयों की अनुशंसा की गयी हैं. वो भी अलग अलग विभाग के कार्यक्षेत्र में आते हैं. उन सब को मिश्रित कर एक ईकाई में परिवर्तित करना भी एक बड़ी चुनौती हैं. भारत में स्वास्थ्य और मृत्यु के प्रति आमजनों की सोच नियतिवादी रही हैं, किस्मत में ऐसा लिखा था तो हो गया स्वास्थ्य ख़राब होना किस्मत से संबंधित हो सकता हैं. लेकिन ख़राब स्वास्थ्य के बाद बेहतर इलाज मिलना देश के निति-नियंता की समावेशी और दूरदर्शी सोच पर निर्भर करता हैं. ये विधेयक स्वास्थ्य का अधिकार सैधांतिक रूप से तो मजबूत हैं लेकिन इसको मौलिक अधिकार बनाने के लिए मजबूत रणनीति, समन्वय और दलगत राजनीति से ऊपर की सोच चाहिए तभी हम पुरे देश को स्वास्थ्य का मौलिक अधिकार दे पाएंगे. खैर प्राइवेट मेम्बर बिल का इतिहास बताता हैं की संभवत इस बिल का भविष्य क्या होगा ? लेकिन वर्तमान में तो ये विधेयक हम सब के सामने एक चर्चा और विमर्श का विषय दे गया हैं.

WRITTEN BY: RAKESH MOHAN SINGH
EDITED BY: MD SHAHZEB KHAN